Monday, 29 January 2018

संबंधो में रमणीकता

संबंधो में रमणीकता

सम्बन्ध जीवन जीने के लिए निहायत जरुरी है | संबंधो को सजीव, सार्थक और मधुर बनाये रखना जीवन की अनिवार्यता है | यदि परस्पर सम्बन्धो  में नीरसता हो, कड़वाहट और रुक्षता हो, एक ऊष्मा, उत्साह और ख़ुशी का अनुभव न हो, तो सम्बन्ध जड़वत रह जाते है | एक दुसरे को कोई प्रेरणा या कोई ऊर्जा मिल नहीं पाती | इसलिए यह जरुरी है कि आपसी संबंधो में शालीनता के साथ-साथ रमणीकता का पुट हो | रमणीकता संबंधो को सरस और सुखदायी बनाती है | रमणीकता का अर्थ सिर्फ हास्य और विनोद नहीं है, बल्कि रमणीकता का अर्थ आपसी व्यवहार की सुन्दरता, सरसता और मधुरता भी है |कोई भी बात खड़ी भाषा में कहने की अपेक्षा यदि रमणीकतासे उसका प्रस्तुतिकरण किया जाए, तो वह अधिक ग्राह और प्रभावशाली होती है |राम्निकता व्यक्ति गंभीर और बड़ी से बड़ी बात भी बड़ी सादगी और सरलता से कह सकता है | यदि दूसरों की त्रुटियाँ भी रमणीक अंदाज में बताई जाती है, तो सम्मुख व्यक्ति उसका बुरा नहीं मानता, बल्कि उसका ध्यान अपनी गलतियों पर सहज ही चला जाता है |

मर्यादा और संयम रुपी अंकुश भी जरुरी

संबंधो में रमणीकता का अर्थ यह नहीं है कि हम सदा हलके-फुल्के हँसी-मजाक करते रहे, ठिठोली करते रहे, ठहाके लगाते रहे | रमणीकताहमेशा संबंधो की गरिमा के अनुरूप संयमित और मर्यादित होनी चाहिए | साथ-साथ समय और परिस्थिति अथवा उचित अवसर को ध्यान में रखते हुए ही रमणीकता का प्रयोग किया जाना चाहिए | असमय हास्य,विनोद करना अथवा अमर्यादित तरीके से किसी का मजाक बनाना संबंधो की गरिमा के विपरीत है और इससे दूसरों की भावना भी आहत होती है | इसलिए रमणीकता के साथ-साथ संयम व् मर्यादा तथा शालीनता का समिश्रण भी उतना ही जरुरी है, परन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम इतने अधिक गंभीर और आत्ममुखी न बने, जो हमारे व्यव्हार से दूसरों को एक उबाऊ,निरस्त और उदासी का बोध होने लगे, क्योंकि ऐसा होने पर लोग हमारे निकट संपर्क में आना नहीं चाहेंगे और उन्हें उत्साह और ख़ुशी का अनुभव नहीं होगा | इसलिए यह याद रखे कि शालीनता के साथ-साथ रमणीकता भी उतनी ही जरुरी है और यही संबंधो का आकर्षण और उसकी ऊष्मा

Saturday, 27 January 2018

प्रभु से रिश्ता, बनाएगा फ़रिश्ता




इस द्रश्य जगत में मनुष्यों का वस्तु और व्यक्तियों से कुछ न कुछ जुड़ाव अथवा रिश्ता बन ही जाता है | देह आत्मा को सबसे पहले बांधने वाली और खीचने वाली है | निज शरीर से रिश्ता मृत्यु तक नहीं छूट पाटा, इसी प्रकार से देह के संबंधो की लम्बी सूची है, देह संबंधो के ये रिश्ते अथवा नाते ममत्व अथवा मोह के बंधन में परस्पर लगाव और आकर्षण में बांधने वाले है | मनुष्य संसार में जीवनयापन के लिए अनेकानेक साधनों को अपनाता है और इन साधनों से भी उसका लगाव व् मोह हो जाता है | पद,पैसा,मान-शान,जीव-जंतु इनमे भी कही न कही मन की रगे जुडी रहती है | दुनिया के रिश्ते जितनी सहजता से बनते है, वे बनकर मिटते नहीं है | देह व् देह के संबंधो में कदम-कदम पर अपेक्षा और निहित स्वार्थ जुड़े रहते है | इस प्रकार देह और देह के पदार्थो के रिश्ते व्यक्ति को इस भौतिक जगत से न्यारा और उपराम होने नहीं देते, उसका मन और बुद्धि बार-बार विनाशी व्यक्ति और वस्तु में उलझते रहते है | इसलिए एक सांसारिक व्यक्ति के लिए फ़रिश्ता बनना बहुत असंभव कार्य है |

                 फ़रिश्ता स्थिति क्या है ?

फ़रिश्ते का अर्थ ही है, जिसका फर्श अर्थात धरा के व्यक्तियों और वस्तुओं से कोई रिश्ता न हो, जो फर्श अर्थात धरती पर संसारी जीवन जीते हुए भी,अर्शवासीन्यारा और प्यारा हो, निरासक्त और निर्मोही हो | अतः फ़रिश्ता वह है , जो देह में रहते हुए भी देहातीत और कर्मातीत है | फैढ़स्ता दादा हल्का, उपराम, कर्म करते भी कर्मफल से न्यारा, संबंधो को निभाते हुए भी, एक न्यासी की तरह रहते वाला और वस्तुओं का उपयोग करते हुए भी निरासक्त और निर्लिप्त होता है | मनुष्य का शरीर पाकर और इस भौतिक जगत में लोक कर्म करते हुए, साधन-सुविधाओं का उपभोग करते हुए उन सबको लगाव से मुक्त होना, न्यासी,साक्षी और द्रष्टा बनकर रहना,किसी भी पुरुषार्थी के लिए इतना आसान कार्य नहीं है |

          परमात्म संग से फ़रिश्ता स्थिति-

जीवन-व्यव्हार में अनुभव होता है कि जहाँ एक ओर देह के सम्बन्ध हदों में बाँधने वाले, फर्शवासी बनाने वाले है, फिक्रमंद बनाने वाले है, मोह और आसक्ति को बढ़ने वाले है, वही सीके विपरीत पवित्रता के सागर,स्नेह के सागर, निराकार ज्योति स्वरुप परमात्मा शिव का सान्निध्य समस्त द्रश्य जगत से देह और देह के संबंधो से न्यारा बनाने वाला कर्म में निमित्त भाव और व्यव्हार में निरासक्त वृत्ति बनाने वाला है | जो आत्मा प्रभु संग के रंग में रंग जाती है, प्रभु स्नेह की डोर में बंध जाती है, उसे यह विनाशी दुनिया और दुनिया के देह सम्बन्ध रास ही नहीं आते, वह बुद्धि से उपराम हो जाती हो और उसका मन परमात्मा में ही लगा रहता है | इसलिए ऐसी आत्मा फर्श पर रहते हुए अर्शवासी बन जाती है |
                    
              फ़रिश्ता अर्थात डबल लाइट-

फ़रिश्ता बन्ने वाली आत्माएं सदा पवित्रता की पोशाक पहने हुए, लाइट अर्थात् हल्की और उपराम होती है | दूसरा वे पवित्रता के दिव्य प्रकाश से सदा प्रकाशित होती है | डबल लाइट वही बन सकता है, जिसका बुद्धियोग सदा पवित्रता के सागर लाइट हॉउस परमात्मा से जुटा रहता है | लाइट हॉउस की लाइट और माइटयोगी आत्माओं को विकारो और बुराइयों के व्यर्थ कीचड़े अथवा बोझ से मुक्त कर देती है अर्थात ऐसी आत्मा फ़रिश्ता बनकर उन्मुक्त गगन में उड़ती है | विषय-विकारी दुनिया की धूल भी उसे स्पर्श नहीं कर पाती | फ़रिश्ते राग द्वेष से परे देवदूत की तरह होते है | वे कभी किसी को आहत नहीं करते, किसी को क्षति नहीं पहुंचाते,बल्कि दूसरो को सहारा व् अवलंबन ही प्रदान करते है | देवत्व को प्राप्त करने से पूर्व हर ब्रह्मामुख वंशावली ब्राह्मण को चलता-फिरता दिव्य फ़रिश्ता बनना ही है | तो आइये विनाशी रिश्तों से परे दिव्य फ़रिश्ते बने |

Tuesday, 23 January 2018

वरदान देने आये शिव भगवान्



    अमरता का देने वरदान, आये शिव भगवान

परमात्मा शिव स्वयंभू विश्व कल्याणकर्ता, दिव्य चक्षु विधाता और गीता ज्ञानदाता है | उनके अनेक नामो में एक नाम अमरनाथ भी है, जिसका भाव यह है कि परमात्मा शिव मानव आत्माओं को अमरत्व का वरदान देते है और वरदान देने के लिए परमात्मा को धरा पर अवतरित होना पड़ता है |
            
           निराकार ने लिया साकार का आधार

शिव परमात्मा को एक ओमकार,निराकार,अजन्मा,अभोक्ता अयोनि और अशरीरी भी कहा जाता है | कारण कि उनका कोई निज शरीर नहीं है, वे अति सूक्ष्म ज्योतिर्बिंदु व् निराकार है | परंतू जगत कल्याण के लिए धर्मग्लानि के समय निराकार शिव को धरा पर अवतरित होना पड़ता है |  अतः इसके लिए वे साकार ब्रह्मा के वृद्ध तन का आधार लेते है और ब्रह्मा मुख से वे सत्य गीता ज्ञान अथवा अमरकथा सुनाते है |
                    
                अमर कथा का रहस्य –

कहते है शिव ने पार्वती को कैलाश पर्वत पर अमरकथा सुनाई | वास्तव में जगत का कल्याण करने वाले परमात्मा द्वारा सिर्फ पार्वती को अमरकथा सुनाना यथार्थ और युक्तियुक्त नहीं लगता है | इसका आध्यात्मिक मर्म यह है कि शिव परमात्मा पर बलिहार होने वाली हर आत्मा पार्वती के समान है | वैसे भी परमात्मा को पुरुष और आत्मा को स्त्री रूप में चित्रित किया जाता है | अतः परमात्मा ने सिर्फ एक पार्वती को नहीं , अपितु आत्मा रुपी अनेक आत्माओं को अमरलोक जाने का विधान बताया | इसीलिए इस कथा को अमरकथा कहा जाता है, जिसे सुनकर आत्मा को अमरत्व का वरदान प्राप्त हो जाता है |
                   
                 अमरलोक की यात्रा

परमात्मा ने ब्रह्मामुख से ज्ञान देकर यह रहस्य स्पष्ट किया है कि यह स्रष्टि आज से 5 हजार वर्ष पूर्व पवित्रता,सुख,शांति से संपन्न दैवी स्रष्टि अथवा अमरलोक थी, जिसे सतोप्रधन काल या सतयुग कहा जाता था | यहाँ मनुष्यात्मा रोग-शोक से मुक्त होती है और उसकी अकाल मृत्यु भी नहीं होती है | इसलिए इस युग को अमरलोक अथवा सुखधाम कहा जाता है | कालांतर में मानव आत्माएं धीरे-धीरे पतित बनती गयी | विषय-विकारो के वश होने के कारण उनकी अमरता का वरदान छीन गया और इसलिए कलियुग में रोग-शोक,दुख –अशांति व्याप्त है | पुनः परमात्मा अमर भाव का वरदान देकर और अमरकथा सुनकर आत्माओं को दैवी स्रष्टि अथवा अमरलोक में चलने लायक बना रहे है, परन्तु अमरता का यह वरदान वही आत्मा प्राप्त कर सकती है, जो इस घोर कलियुग के अंत समय विषय-विकारो का त्याग करके पवित्र और राजयोगी बनती है | वर्तमान समय अमरता का यह वरदान अमरनाथ शिव भगवान् प्रजापिता ब्रम्हा व् ब्रह्मा वत्सो के माध्यम से सबको लुटा रहे है | तो आइये सच्ची अमरकथा सुनकर अमरलोक सतयुग में चलने की तैयारी करे और अमर भाव का दिव्य वरदान प्राप्त करे |

Friday, 19 January 2018

मै कहाँ खो गया हूँ.............?




जब हम किसी भी प्रोफेशनल या आम व्यक्ति से बात करते है तो वो अपनी समस्याओं के बारे में, परिस्थतियों के बारे में और कठिनाइयों की ही बात करता है | वो अपनी सूझ-बूझ, अपने परसेप्शन और मान्यताओं के आधार से उसके हल भी ढूँढने की कोशिश करता है, परन्तु वो अपनी उन कठिनाइयों को दूर करने के चक्कर में और ही उलझता जाता है | वो अपनी आकांक्षाओं,इच्छाओं व् सामाजिक,पारिवारिक दायित्व के निर्वहन हेतु कई शार्ट कट का रास्ता भी अपनाने की कोशिश करता है | परिणामस्वरूप वो अपनी उलझनों के भंवर में और ही उलझता हुआ अपने को पाटा है | उदाहरण स्वरुप,किसी व्यक्ति के घर में चूहे बहुत थे और खाघ पदार्थ को नुक्सान पहुंचाते थे | तो किसी ने कहा कि ऐसा करो, एक बिल्ली को पाल लो, जिससे आपकी समस्या हल हो जायेगी | वो बिल्ली ले आया, बिल्ली चूहे को तो खा जाती , लेकिन साथ ही उसका रखा हुआ दूध भी पि जाती | वो फिर परेशान होने लगा | फिर किसी और ने सलाह दी कि ऐसा करो की कुत्ता पाल लो | कुत्ते के कारण तो बिल्ली भाग गयी, लेकिन कुत्ता सारा दिन भौं-भौं करके उसका सर दर्द कर देता था | आज वैसी ही हालत हम सबकी है | हम ढूंढनातो चाहते है हल,समस्याओं का समाधान, परन्तु एक समस्या के चक्कर से छुटने के बदले और एक समस्या हमारे जीवन से जुड़ जाती है हाल ही में ज्ञानसरोवर में हुए मीडिया कॉन्फ्रेंस के दौरान कई सारे आपसी डिस्कशन, डायलाग हुए जिसमे ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन.के सिंह ने बहुत तर्कपूर्ण उत्तर दिए | उन्होंने कहा कि यहाँ मैंने देखा कि इस संस्थान के भाई बहनो के चेहरों में जो संतुष्टता और ख़ुशी व् सुकून दिखाई देता है, वो मुझे कही और नहीं दिखता | समस्याए बेशक इनके सामने भी आती होगी, कोंकी ये भी तो कलियुग में ही रहते है, लेकिन विचार करने कि बात है की ऐसी विपरीत परिस्थितियों में रहते भी ये अपने आप को खुश कैसे रख पाते, ये खोज का विषय है |
हम आज सारी समस्याओं का समाधान अपने परसेप्शन के आधार से ढूंढने कि कोशिश करते है, लेकिन पाते है की हर कही जहाँ भी किसी को छुते है तो वहां समस्याओं का तात्कालिक निपटारा हो भी जाता है लेकिन फिर एक नई समस्या हमारे जीवन में जुड़ जाती | ऐसे में निष्कर्ष यही पाया की समस्याओं का हल हम बाहर से ढूंढने की कोशिश करते है, लेकिन समस्याओं का समाधान तो हमारे भीतर से ही मिल पायेगा | राजयोग मेडिटेशन एक ऐसी विधि है जहाँ ‘इन टू आउट’ की कला को निखारा जाता है | अगर देखा जाए तो व्यक्ति के जीवन की चाहत भी क्या है, सुख, शांति, प्रेम,आनन्द,शक्ति,ज्ञान, पवित्रता | इसी को पाने के लिए ही तो वो सारे दिन दौड़ता भागता रहता है | लेकिन जरुर है, कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चो को खुश और आगे बढ़ता हुआ ही देखना चाहते है | अगर हम बोलचाल की भाषा में कहते भी है कि परमात्मा हमारा माता-पिता है तो भला वो भी हमें दुखी कैसे देख सकता है ! उन्होंने हमें सारी शक्तियाँ और गुणों से सुसज्जित कर इस स्रष्टि पर खेल खेलने के लिए भेजा, परन्तु हम खेलते खेलते अपने आपको भूल गए और अपनी शक्तियों को भी व्यर्थ में ही खर्च कर दिया, उसे खो दिया | परिणाम स्वरुप आज हम हर बात में चिल्लाते, मांगते फिरते है | हमने परमात्मा प्रदत्त शक्तियों को कार्यों में प्रयोग ही नहीं किया, ना ही उसके तौर तरीके और विधि को ही हम जानते है | जब हम परिस्थितियों का निर्माण इस धरा पर होता है | तब परमात्मा पुनः राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से ज्ञान देकर फिर से हमारी उर्जा को पुनर्जीवित करते है | पर शर्त यह की जहाँ विधि से सिद्धि मिलती है तो विधिपूर्वक उसका प्रयोग करे, तभी जीवन में जीवन में आने वाली कठिनाइयों, समश्याओं और परिस्थितियों को प्रसन्न रहकर उनका निवारण कर सकते है | कहते है ना, हमने समस्याओं का समाधान बाहर ढूंढने की कोशिश की, पर हमें यह मालुम ही नहीं था कि हमारी सभी समस्याओं का समाधान हमारे पास ही है | किसी ने खूब कहा है ‘जिन्दगी भर एक ही भूल करते रहे, धुल थी चेहरे पर और आइना साफ़ करते रहे’ | समस्याएं मनुष्य खुद ही अपने गलत तौर-तरीके से उत्पन्न करता है, और फिर हल ढूढने की कोशिश बाहर करता है |
एक कहानी भी है की, एक वृद्ध महिला अपनी झोपड़ी में बैठ अपना झोला खोलकर कोई छोटी सी वस्तु  खोजने लगी | वहां अँधेरा था, और वो वास्तु वहां नीचे गिर गई जो मिल नहीं रही थी | वो बाहर रास्ते पर स्ट्रीट लाइट की रौशनी में वो वस्तु ढूंढने लगी, इतने में चार युवक वहां से जा रहे थे | उन्होंने देखा और कहा अम्मा, क्या ढूँढ रही हो ? उसने उत्तर दिया, तो वे सभी चारो युवक खोजने में उसकी मदद मदद करने लगे | ऐसे में एक और महिला वहां से गुजर रही थी, उसने भी यह देखा कि एक वृद्ध महिला और चार युवक कुछ ढूँढ रहे है, प्रत्युत्तर में वृद्ध महिला ने कहा कि मेरी वस्तु गम हो गई है, उसे ही खोज रहे है | दूसरी महिला ने कहा, आपकी वस्तु कहाँ गम हो गई ? तो वृद्ध महिला ने कहाँ कि वो तो झोपडी में गिर गई है, वहां गम हो गई है | तब दूसरी महिला ने कहाँ कि जब वहां वहां गम हुई है तो वहां खोजना चाहिए ना, यहाँ क्यों ढूँढ रहे है | तब वृद्ध महिला ने कहा कि झोपड़ी में अँधेरा है, इसलिए दिकाही नहीं पड़ती, इसलिए हम उजाले में यहं ढूँढ रहे है | ठीक वैसे ही आज हर व्यक्ति आज हर व्यक्ति इसी दौर से गुजर रहा है | वो चाहता है तो अपने जीवन में शांति और ख़ुशी, परन्तु वो ढूंढता  कही और है | ऐसे में आज हम तो यही कहेंगे कि प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय  इस विश्व के सामने एक विकल्प के रूप में उभर रहा है, जो ये ज्ञान देकर समस्याओं का समाधान दे रहा है |

 

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