Sunday, 31 December 2017

एक अदभुत उड़ान



            एक अदभुत उड़ान

एक सुखद अहसास, एक सुखद मंजिल | एक स्थान से एक साथ कई पंछी बड़ी तीव्रगति से उड़न भरने की तैयारी में थे | बस, उनको कमांडर से आदेश मिलने की देती थी | फिर क्या था, कमांडर ने उन सभी पंछियों का बड़े ही सुन्दर ढंग से अभिवादन, अभिनन्दन किया और सभी पंछी एक साथ पुरे वेग से अपना स्थान छोड़ते हुए नीलेआकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचे जा रहे थे | धरती की चमक,आकर्षण से दूर होते नजर आ रहे थे | उन सभी पंछियों को एक गंतव्य स्थान तक पहुचना था | कुछ पंछी बिना किसी को देके गंतव्य पर पंहुचने में सफल हो रहे थे, कुछ कभी अपनी रफ़्तार को देखते तो कभी दूसरे उड़ते हुए पंछियों को |इस कारण उनकी उड़ान कभी तेज तो कभी मंद पड़ रही थी | कुछ पंछी उड़ते-उड़ते न जाने किस मज़बूरी के कारण आचानक ही धरती पर वापिस उतर रहे थे जबकि वे नहीं चाहते थे कि वे मंजिल को छोड़ धरती के दायरे में उतरें परन्तु वे तीव्रगति से जिचे उतरते ही जा रहे थे ! उतरते ही जा रहे थे !!
उतरने वाले पंछी पुरे वेग के साथ उतरते जा रहे थे | अब उनका उतरना थम चुका था क्योंकि अब वे पूर्ण रूप से धरती की पकड़ में थे | वे उड़ने का भरसक प्रयास कर रहे थे लेकिन अपने को कमजोर महसूस कर रहे थे | उनको धरती की पकड़ में काफी पीड़ा महसूस हो रही थी | वे उड़ने की कोशिश करते लेकिन गिर जाते , बार-बार का प्रयास, बार-बार गिरना, बार-बार का संभलना  उनको बड़ा हैरान कर रहा था | अचानक ही उनके आजू-बाजू में एक मीठी मधुर आवाज गूंजने लगी..... “आप तो होलिहंस हो, आप तो सदा ही उड़ने वाले स्वतंत्र पंछी हो | उड़ते रहो, उड़ते रहो,उड़ते रहो, | आपको कोई बांध नहीं सकता | आपको किसी ने नहीं बांध रखा है |आप मुक्त हो | अपनी मंजिल तय करो, आप पूरे वेग के साथ उडो | अगर अभी पूरे
 वेग के साथ नहीं उड़े तो मंजिल पर कभी नहीं पहुँच सकोगे | फिर से शैतान के चंगुल में फंस जाओगे और मारे जाओगे | इसलिए पूरे वेग से उड़ो | मै कह रहा हूँ कि उड़ो, आपको कोई बांधने वाला नहीं, यह आपके मन का भ्रम है कि आपको किसी ने बांध रखा है अथवा आप किसी बंधन में है |’’ यह आवाज उनके आस-पास सूक्ष्म रूप से गूंज रही थी |
इस मधुर ध्वनि की तरंगे अन्तर्मन को बार-बार छु रही थी,अचानक ही उनके अन्दर एक करंट-सा आया और वे अब धीरे-धीरे धरती से उड़ने का प्रयास करते-करते,देखते ही देखते नील आकाश की ऊँचाइयों में ओझल हो गए | एक आश्चर्यवत  घटना हुई कि उनसे पहले उड़ने वाले पंछी अब उनसे काफी पीछे रह चुके थे और वे अपनी इस अदभुत उड़ान पर बड़े ही आनन्दित हो रहे थे , उनकी इस उड़ान में बीच-बीच में फिर वही ध्वनि सुने पद रही थी, “आओ, मेरे नैनों के नुरे रत्नों,आओ, आपका बहुत-बहुत स्वागत है, स्वागत है |” आश्चर्य,महँ आश्चर्य ! कैसी अदभुत उड़ान ! कैसा अदभुत सफरनामा !
आप समझ चुके होंगे कि इस अदभुत उड़ान के पीछे क्या रहस्य छिपा है | अभी पुरुषोत्तम संगमयुग में परमपिता परमात्मा शिव बाबा ने हम आत्म-पंछियों को एक लक्ष्य दिया है, वह है, शिव बाबा के स्वभाव , बन, कर्तव्य में अपने को समान बनाना | यही हमारे पुरुषार्थ की सम्पूर्ण मंजिल है | हम आत्म-पंछी उसी मंजिल की ओर रोज-रोज पुरे वेग से उड़ान भर रहे है | कई आत्म-पंछी तो शिव बाबा समान बन चुके है,कुछ आत्म-पंछियों में थोड़ी-सी कसरअभी भी बाकी रही हुई है, कुछ अधिक वेग से उड़ान पर है, मंजिल को प्राप्त करने की आशाएं उनके दिल में समाई पड़ी है | लगता है, वे भी जल्दी ही अपनी मंजिल को प्राप्त कर जायेंगे | कुछ पंछी अभी भी देह, देह के पदार्थ, रसनाएँ, देह के संकल्प, स्वभाव,संस्कार की धरनी को पकड़े हुए है | वे इन सबको छोड़ने का पूरा प्रयास कर रहे है, बहुत कुछ छोड़ पाने में सफल भी हो चुके है लेकिन अभी भी कुछ बाकी रह गया है | उसके छुटने की कशमकश चल रही है | वे सोचते है कि हमको धरती ने पकड़ रखा है, वे उड़ना भी छह रहे है लेकिन धरती के आकर्षण को छोड़ना नहीं चाह रहे है | उन आत्म-पंछियों को वही मधुर-मधुर धुन सुनाई देती है – “ मेरे मीठे बच्चो,आओ, जल्दी-जल्दी उड़कर मेरे पास आ जाओ |’’ आह्वान का यह गीत ब्रह्मा बाप वतन में बैठे-बैठे गा रहे है | शिव बाबा कह रहे है कि बच्चे,छोड़ो तो छुटो,छोड़ो तो छुटो |
इस आवाज को कुछ आत्म-पंछियों ने बार-बार सुना तो छोड़ दिया धरती की खिचावट को और अपने मन-बुद्धि से मंजिल की ओर उड़ चले | शरीर में होते हुए भी विदेही स्थिति द्वारा सूक्ष्म लोक,ब्रह्मलोक की उड़ान भर रहे है | इसी उड़ान में उनकी मंजिल समाई पड़ी है | ऐसा उनका अपना निश्चय व विश्वास कहता है |
तो आओ आप और हम सभी मिलकर अब उड़ चले, समय कह रहा है , प्रकृति कह रही है, भक्त आत्माएं कह रही है, प्रकृतिपति शिव बाबा भी कह रहे है | बच्चे अब तो अपने सर्व बन्धनों से मुक्त करो और मेरी पलकों पर बैठ उड़ चलो | यह समय तीव्र वेग से उड़ने का है, चलने का समय गया,जम्प लगाने का भी समय गया, अब तो तीव्र गति से उड़ने का समय है, तभी मंजिल पर पहुँच पाएंगे |” हमसे आगे अभूत आत्म-पंछी निकल चुके है, अब जल्दी ही समापन होने वाला है | ऐसी घड़ी में हम कही अटके, लटके, भटके हुए तो नहीं है ? नहीं, नहीं | हिम्मत मत हारो, स्वयं प्रक्रतिपति मालिक आपके साथ है, वे स्वयं कह रहे है कि जब मैंने आप सबको अपनी संतान के रूप में स्वीकार किया है तो जो भी हो, जैसे भी हो, आप मेरे हो, मई करोड़ो भुजाओं वाला सदैव आपके साथ हूँ,आप हिम्मत मत हारो | आप फिकर किस बात की करते हो ? बाबा कहते है, “ बच्चे, घबराओ नहीं, अपने को सर्व बन्धनों से मुक्त करो और अन्य आत्माओं को भी मुक्त होने में सहयोग करो |” अब यह रेस भी समाप्ति के कगार पर है , कही ऐसा न हो की सभी आगे चले जाएँ और हम पीछे रह जाएँ | वर्तमान समय बाबा की मुरलियां बहुत शार्ट और राजो भरी चल रही है जिनको गहरे से समझने की बहुत ही आवश्यकता है | वर्तमान समय बाबा से मिलन के समय जब कई बार बाबा एक ही शब्द को बार-बार अंडरलाइन करते है तो कई समझते है कि बाबा, एक ही बात को बार-बार रिपीट कर रहे है | नहीं, ऐसा नहीं है | बाबा एक ही बात को रिपीट नहीं कर रहे है बल्कि अभ्यास करा रहे है, हमारे ध्यान पर ला रहे है और कह रहे है कि बच्चे, आपके दिल में कौन ? मेरे दिल में तो आप भाग्यशाली बच्चे हो, जिन्होंने मुझ साधरण रूप में आये हुए परमात्मा पिता को पहचान लिया |
लेकिन अभी हम अपने दिल को चेक करे कि वहां कौन ? स्थूल बाते, व्यर्थ की कचरा-पट्टी की बाते, इधर उधर के व्यर्थ समाचारों के लेन-देन की बाते, तेरी-मेरी की बाते, स्थूल समाप्ति के लेन-देन की बाते, मोबाइल-कंप्यूटर-इन्टरनेट में व्यर्थ अपने को उलझाएँ रखने की बाते | और भी बहुत साड़ी बाते है जिनके कारण पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मणों का समय व्यर्थ जा रहा है, इअसे ही व्यर्थ जाने वाले समय को बचाने की आवश्यकता है |
हम चेक करे- आज वो खुमारी कहाँ गई ? जब हम शुरू-शुरू में ज्ञान में आये थे और घंटो- बैठ योगाभ्यास किया करते थे, वो नशा,वो न्यारापन,प्रभु के प्रेम में दुबे हुए वो नैन-चैन वो एकांत और एकाग्रता का अभ्यास, वो देह से अलग होने का अभ्यास, वो त्याग- तपस्या  की लहर,अतीन्द्रिय सुख-चैन की बंसी आज कहाँ गम हो गई ? इस सहूलियत भरी दुनिया में अपने को सहूलियतो से इतना भर दिया है कि कही भी सहन करने की, त्याग करने की, परेशानी को झेलने की जैसे कि आदत ही ख़त्म हो गई है | जरा-सी भी परेशानी हुई नहीं कि आत्मा का चिल्लाना-चीखना चालू,सब्र का बांध जैसे कि टूट गया हो, अन्दर की सूक्ष्म स्थिति का क्या हाल होता है, हम सभी अच्छी तरह से परिचित है | फिर आने वाले भयानक समय का सामना कैसे कर सकेंगे ? क्या ऐसा संभव नहीं हो सकता कि  सप्ताह में एक दिन के लये ही सही, टोटल कंप्यूटर,इन्टरनेट,मोबाइल बंद रखे जा सके और उस दिन प्यारे प्रभु की दिव्य स्म्रतियों में अपने को डुबो सके, और ये भी संभव न हो तो कम से कम सप्ताह में एक दिन कंप्यूटर और इन्टरनेट तो बंद रख ही सकते है, क्या विचार है आपका इस सन्दर्भ में !!!
दिल में एक दिलाराम शिव बाबा की मधुर स्मृति की बजाय जब इस प्रकार की व्यर्थ स्मृतियाँ होंगी तो आत्मा की गति क्या होगी ? अन्त-मते-सो-गते अर्थात.......... !!!
अभी अपने को एकांत और एकग्रता की बहुत ही आवश्यकता है, ब्रह्ममुखता से अन्तर्मुखता की बहुत आवश्यकता है, अपने विचारो को नया मोड़, सकरात्मक मोड़ देने की आवश्यकता है, सहनशक्ति को बढ़ने की आवश्यकता है , एक सकारात्मक, शक्तिशाली संकल्प में अपने को लम्बे समय तक टिकने की आवश्यकता है जिसके द्वारा हम आत्म-अन्वेषण कर सके और उस महान लक्ष्य, महान मंजिल को प्राप्त करे जिसके लिए शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा हम सभी ब्राह्मण कुलभूषणों पर वर्षो से म्हणत कर रहे है अन्यथा वो सपना,सपना ही रह जायेगा | फिर शायद दिल से यही निकलेगा कि दिल के अरमां,आंशुओं में बह गए,इस दिल के टुकड़े हजार हए, एक कही गिरा तो दूसरा कही गिरा | फिर तो शायद दिन और रात अँधेरे के समान ही लगेंगे और दिल छटपटायेगा कि अभी उजाला क्यों नहीं हो रहा है !!! शायद अपनी छाती भी पीट कर रोना पड़े | इसलिए भगवान् की श्रेष्ठ मत पर चलो |

Thursday, 28 December 2017

विश्वास और शक्ति



विश्वास की शक्ति

विश्वास में गजब की शक्ति है | हम जिन बातो में विश्वास रखते है वो हम पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती  है | वर्तमान समय बहुत- से दुखो का कारण  हमारा विश्वास, हमारी मान्यताएं भी है | जब हम सत्य बातो में, सकारात्मक बातो में विश्वास करते है तो सफल होते है लेकिन यदि नकारात्मक बातो में विश्वास रखते है तो अवश्य ही जीवन दुखदायी बन जाता है | अतः प्रत्येक पहलु को देखते, समझते हुए सकारात्मक बातो में ही विश्वास रखना चाहिए |

कैसे जाने, विश्वास सकारात्मक है या नकारात्मक ?

यदि हमें किसी बात या घटना से दर लगता है तो अवश्य हमें उस की नकारात्मक पर विश्वास है | उदाहरण के लिए, किसी का विश्वास है ‘मेरे साथ हमेशा बुरा होता है’, यह विश्वास उसके जीवन में ख़ुशी आने नहीं देगा | हम चाहे उसे ख़ुशी, आनंद की कई बाते सुनाएँ परन्तु जब तक उसका यह विश्वास टूट ना जाए तब तक वह खुश नहीं हो सकता | हमारे विचार जैस एही , उसी प्रकार की घटनाओं  को अपनी ओर आकर्षित करते है और वे घटनाएं बार-बार घटित होने से विश्वास और भी गहरा होता जाता है | किसी का विश्वास हो सकता है, ‘मै सफल नहीं हो सकता ‘, ‘लोग बुरे होते है,’ क्रोध के बगैर काम कैसे होगा,’ ‘मै यह नहीं कर सकता’ ‘टेंसन तो जरुरी है,’ मेरा योग नहीं लगता,’ ‘मुझे कुछ नहीं दिखता’ जब तक हम ऐसे वाक्यों में विश्वास रखेंगे तब तक हम जो पाना चाहते है उससे हमेशा दूर ही रहेंगे | हम नकारात्मक  बात में विश्वास रखते है, हमारा मन कसकर उसे पकड़ लेता है और हमें दुःख, अशान्ति,डर, चिंता, भय का अनुभव होता है | इसके विपरीत यदि हम सकारात्मक बातो में विश्वास रखते है जैसे- ‘मै सब कुछ कर सकता हूँ’, ‘कुछ भी कठिन नहीं’, ‘टेन्शन मुझे छु भी नहीं सकता’, ‘परमात्मा मेरा साथी है’ तब हम सफलता की अदभुत शक्ति का अनुभव करेंगे | यदि जीवन में दुःख, कष्ट,डर, अशान्ति आदि का अनुभव होता है तो अवश्य हमारा विश्वास नकारात्मक है और यदि प्रेम, आनंद, शान्ति, सुख आदि का अनुभव करते है तो हमारा विश्वास सत्य और सकारात्मक है |

बदले अपने विश्वास

यदि हम नकारात्मक मान्यताओं को सकारात्मक विश्वास में बदल दे तो जीवन सुखमय-शांतिमय बन जाएगा | कुछ लोग पुराणी मान्यताओं, रीति-रिवाजो, कर्मकाण्ड से चिपके रहते है, उन्हें बदलना या छोड़ना ही नहीं चाहते तो वे जीवन में नयेपन व सुख-शांति का अनुभव भी नहीं कर पाते है | परिस्थिति भले विपरीत हो पर यदि हम सकारात्मक हो तो परिस्थिति  धीरे-धीरे  हमारे अनुकूल हो जायेगी | विश्वास जीवन की शक्ति है | जिन बातो में हम विश्वास करते है आत्मा की साड़ी शक्तियाँ उसी ओईर बहने लगती है | महाभारत में एकलव्य का वर्णन है, उसने गुरु द्रोण  के न सिखाने पर भी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बनकर दिखाया क्योंकि उसने विश्वास को अपनी शक्ति बनाया | आज भी भक्तो को उनकी इच्छानुसार फल कैसे प्राप्त हो जाता है जबकि देवता तो हजारो साल पहले थे | उनकी मूर्ति में शक्ति है या साधक के विश्वास में ? ज्योतिषी रत्न-अंगूठी देकर कहते है,आपका कार्य होगा, अवश्य होगा | कार्य होता भी है परन्तु कैसे ? क्योंकि उस व्यक्ति को विश्वास हो जाता है, मेरा कार्य होगा | अब अंगूठी में शक्ति है या व्यक्ति के विश्वास में ?
भगवान में विश्वास

कई लोग कहते है, हम भगवान को क्यों माने ? इससे हमें क्या फायदा होगा ? हम इसलिए माने क्योंकि इससे हमारी भावनाएं सुन्दर होगी,अनुभूतियाँ आनंदमय बनेगी, हमारे विचार सकारात्मक व् जीवन सहज बनेगा, हमारा मन बुराइयाँ छोड़ देगा व् जीवन में सुख- शांति का अहसास बढ़ेगा | आजकल मिटा सकते है तथा एक रिसच के मुताबिक नास्तिक लोग, आस्तिक लोगो की तुलना में अधिक बीमार पड़ते है | भगवान पर विश्वास हमें स्वास्थ्य,ख़ुशी,आनंद सब कुछ प्राप्त कराता है |

स्वयं में विश्वास

हमें स्वयं पर विश्वास रखना चाहिए, हम जो है, जैसे है,अच्छे है | ‘सर्वशक्तिमान परमात्मा की संतान हूँ, यह निश्चय रखकर कोई भी कार्य करेंगे तो सफलता अवश्य प्राप्त होगी | जो व्यक्ति स्वयं पर भरोसा नहीं रखता, वह हमेशा सोचता है, पता नहीं मुझसे होगा या नहीं , मै कर पाउँगा या नहीं |  ऐसा व्यक्ति जीवन में कुछ भी हासिल नहीं कर सकता इसलिए यह संशय रूपी कीड़ा निकलकर स्वयं पर विश्वास करो | संशय का कीड़ा विश्वास को खा जाता है | स्वाभिमान व् विश्वास से भरा व्यक्ति सब पर अपना प्रभाव छोड़ता जाता है | सम्बन्धो में भी यदि हम एक –दुसरे पर विश्वास रखते है तो रिश्ते मधुर, पारदर्शी एवं सुन्दर बनते जाते है | आजकल सम्बन्धो की कटुता एवं उनके बिखरने का कारण भी एक-दूसरे पर विश्वास की कमी है | अतः स्वयं का स्वमान जगाये व् स्वयं को विश्वास से भर दे |

Monday, 18 December 2017

प्रतिशोध और आत्मशोध




शोध शब्द का अर्थ होता है खोज परन्तु जब इस शब्द से पहले ‘प्रति’ अव्यय लग जाता है तो इसका अर्थ हो जाता है बदला | लेने वाला एक प्रकार से शोध (खोजबीन) तो करता है परन्तु वह सामने वाले की करता है |इस अर्थहीन खोज का उसे कोई मूल्य नहीं मिलता बल्कि वह अपने अमूल्य पालो को नष्ट कर देता है | मूल्य तब मिले जब वह प्रतिशोध की बजाय  आत्मशोध करे अर्थात स्वयं की जाँच करे | इससे उसके समय और शक्तियों पर व्यर्थ की आंच नहीं आएगी
कीमती संकल्प हुए स्वाहा

बदला शब्द भी हमें सन्देश दे रहा है कि हम क्या मांग रहे है ? बद माना बुरा और ला  माना लाओ | भावार्थ यही हुआ कि हम आह्वान  कर रहे है कि बुरे को हमारे पास ले आओ | जिसके भीतर बदला लेने की अग्नि सुलगती है उसे यह पता ही नहीं चलता की इसे सुलगाये रखने के लिए वह अपने कितने कीमती संकल्प ईधन के रूप में इसमें झोंक चूका है | झोकते रहने में महीनों और वर्षो गुजर जाते है | इस अन्तहीन निरर्थक प्रक्रिया में वचन और कर्म की शक्ति हां हास भी कम नहीं होता |

बदले अपनी चाहना को

किसी ने हमारी चाहना के प्रतिकूल व्यवहार किया और हम बदले पर उतारू हो गए, क्या हमारी हरेक चाहना ठीक है ? हम दुसरे को बदलने की बजाये अपनी चाहना को क्यों नहीं बदलते ? यह हमारा झूठा अहंकार है कि हम बदला लेकर उसका बहुत कुछ बिगाड़ देंगे, हाँ हमारा बहुत-कुछ अवश्य बिगड़ता जा रहा है | क्या हमने कभी एकान्त में बैठकर आकलन किया कि इस प्रतिशोध की प्रवृत्ति ने हमारा कितना नुक्सान किया ? पिछले 10 सालो से (कम या अधिक समय से) हम इस बोझ को उठाये-उठाये फिर रहे है, क्यों ? क्या इसके बदले कोई धन, पड़ या मान मिला ? नहीं ना, फिर इसे ढोने की मेहनत क्यों ?

टूटते धीरज को संभालिये

हमें जीवन में कोई अभाव है, इसका कारण जिसे भी समझेगे,उसके प्रति क्रोधाग्नि अन्दर भड़कती रहेगी परन्तु जिसे कारण समझ रहे है वह निर्दोष है, दोषी तो मेरा वह कर्म है हो मुझसे हो गया था और अब उसी कर्म का कड़वा फल सामने पाकर धीरज टूट रहा है | मुझे टूटते धीरज को सम्भालना  है, न की धीरज खोकर बदला लेने का एक नया विकर्म और खड़ा कर लेना है
पुरानी स्मृतियों  का धुआ और गर्द भीतर उठते रहते है की उसने ये किया  इसने यह नहीं दिया, अमुक ने यह बोला आदि-आदि | जैसे गर्द और धुंएँ से भरे वातावरण में कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं देता, इसी प्रकार हमारी समझ ही धुंधली हो जाती है | हमें सूझता ही नहीं कि क्या ठीक है, क्या गलत है, क्या करना है, क्या नहीं करना | यह धुंआ हेट तो परखने और निर्णय करने की शक्तियाँ कर्म में आ सके |
                         
                       स्मृतियाँ नहीं, जहर बुझे तीर

बाले की भावना एक धीमा जहर है जिसे पात्र में डाले बिना ही हम बूंद-बूंद पीते रहते है और अमर आत्मा को क्षीण कर उसे मृत समान बना लेते है | जिनके प्रति बदले की आग को संकल्पों की हवा दे-देकर सुलगाये बैठे है, वे हजारो मिल दूर बैठे चैन की नींद सो रहे है, उनके चित्त में हमारी स्मृति तक नहीं, वे उस घटना को दफना चुके है पर हम उसे रोज कब्र से निकल पुनर्जीवित करने में समय लगा रहे है | जिनके प्रति यह आग है वे वर्षो से हमें मिले नहीं आगे कभी मिलें सम्भावना नहीं, वे मिले भी तो कुछ मांगेगे नहीं, हमें कुछ देना नहीं, फिर भी हम उनकी उपस्थिति के भ्रम में जीते है और नाहक उनके कदमो की आहात सुनते रहते है | जला दीजिये इन स्मृतियों को, ये स्मृतियाँ नहीं,जहर बुझे तीर है जो आत्मा स्वयं ही स्वयं को चुभा रही है |

गहरे उतर जाएँ आत्मचिंतन में

प्रतिशोध की दावा है आत्मशोध | हम आत्मा के चिंतन में गहरे उतर जाएँ | भीतर के नेत्र से आत्मा के उजले स्वरूप को देखते हुए उसमे डूबे और महसूस करे कि चमचमाते ज्योतिबिंदु पर प्रतिशोध के काले दाग टिक ही नहीं सकते | ये दाग तो आत्म स्वरुप की विस्मृति के कारण है | अपने इस उजले रूप से इस प्रकार बाते करे, रूहरिहान करे, “ किसी से बदल लेंगे तो वह फिर हमसे लेगा, इस प्रकार यह कड़ी प्राणान्त  तक या उसके बाद भी चलती रहेगी | क्या ही अच्छा हो , हम अपने को बदल ले | अपनी उर्जा अपने परिवर्तन में खर्च करे |” एक कहानी याद आती है –
एक राजा ने मंदिर में प्रवेश करते समय अपनी पादुकाएं द्वारपाल के सरंक्षण में छोड़ दी | द्वारपाल ने देखा, रेशममढ़ी पादुकाओं पर ओसकणों  के साथ  कुछ धूलकण भी आ गए है | उसने आने अंगोछे  से पोछने का यत्न किया | अंगोछा मैला था, पादुकाएं थोड़ी और मैली हो गई | राजा लौटा,द्रष्टि पादुकाओं पर पड़ी, क्रोध आ गया, कड़ककर पूछा, किसने मैली की ? द्वारपाल भयभीत होकर बोला, क्षमा करे महाराज, सेवक से यह भूल..... वाक्य पूरा होने से पहले ही उसके सर प् पादुका का तीव्र प्रहार हुआ, सर फटा, रक्त बहने लगा | राजा तो राजभवन चल गया लेकिन प्रतिशोध की ज्वाला में जलता हुआ द्वारपाल अपने घर गया रो अन्न-जल ग्रहण करना छोड़ दिया | पत्नी ने यह देखा तो समझाया, इस अग्नि में आप अपनी शक्तियों को क्यों नष्ट कर रहे हो, बदला लेने का उपयुक्त मार्ग मै बताती हूँ, उठिए | वे उठे , स्नान किया, भोजन किया और पत्नी के कहे अनुसार विद्याध्ययन  के लिए वाराणसी  चले गए | दस वर्ष के कठोर अध्ययन के बाद आचार्य बनाकर लौटे |
झुक गए राजा

राजा ने अपनी अस्वस्थ माता के उपचार के लिए यज्ञ किया और इन्ही आचार्य को यज्ञ का ब्राह्मण नियुक्त किया | यज्ञ संपन्न होने के बाद दक्षिणा में उन्होंने राजा की कोई भी पुराणी पादुकाएं मांगी और प्रतिदिन उनकी पूजा करने लगे | एक दिन राजा ने अपनी पुराणी पादुकाओं के प्रति इतनी श्रद्धा और लगाव का कारण पूछा | द्वारपाल ने कहाँ राजन, इन्ही की कृपा से आज इस पद पर विभूषित हूँ और फिर पूरी कहानी सुना दी | इस विलक्षण प्रतिशोध से राजा अभिभूत हो उठे | उन्होंने द्वारपाल का सम्मान किया और राजपुरोहित का पद प्रदान कर दिया | द्वारपाल ने प्रतिशोध की अग्नि में जलने की बजाये स्वयं के शोध का मार्ग प्रकाशित किया और इस प्रकाश ने उसे इतना चमकाया कि राजा को स्वयं झुकना पड़ा |
भगवान शिव भी कहते है –
            “सर्व खजानों की व् श्रेष्ठ भाग्य की चाबी एक ही शब्द है ‘बाबा |’ यह चाबी अटक क्यों जाती है ? क्योंकि राइट की बजाये लेफ्ट की तरफ घुमा देते है | स्वचिंतन की बहाए परचिन्तन , स्वदर्शन  के बदले परदर्शन , बदलने की बजाये बदला लेने की भावना रख चाबी उलटी घुमा देते है, तो खजाने होते हुए भाग्यहीन खजाने पा नहीं सकते |”

चित्त पर रखे उजली आत्माओं को

ईश्वरीय खजाने पाने के लिए चाबी सीधी तरफ घुमाएँ अर्थात बदला लेने की बजाये बदलकर दिखाये, प्रतिशोध को आत्मशोध में बदले | जिन लोगो की बुराइयाँ चित्त में राखी रहती है उनसे ही बदला लेने की भावनाए जागृत होती है | मान लिया कि वो लोग बुरे है तो हम क्या चाहते है ?  क्या यह कि बुरे ही बने रहे ? जैसे कोई चीज मैली हो और हम सुबह-शाम यह राग आलापते रहे, अमुक वस्तु बड़ी मैली है, बड़ी मैली है, तो क्या वह साफ़ हो जाएगी ? नहीं ना | उसे मेहनत करके साफ़ करे या किसी से करवाए, तब तो उसके मेल के चिंतन में फंसी हमारी वृत्ति बाहर निकलेगी | जो वृत्ति किसी के मेल का चिंतन कर रही है वह सार्थक चिंतन, कर्म का चिंतन, ईश्वर का चिंतन कैसे कर सकेगी ? हम हर बंधन से मुक्ति चाहते है तो फिर चित्त पर रखे इस मेल से भी तो मुक्त होने सीखे | जैस जमी हुई मेल को उतारने के लिए बहुत रगड़ाई करनी पड़ती है,इसी प्रकार भीतर की मेल उतारने के लिए बार-बार स्मरण करे, “कर्म की कलम जब भाग्य लिख रही थी तब इनके हिस्से जो आया, ये कर रहे है | अन्य आत्माओं की तरह ये भी परमात्मा पिता के बच्चे है, मूल रूप में उन्ही के समान गुणवान है,, उन्ही जैसा रूप इनका है | मेरा वो कर्म रुपी धागा जो इनके पार्ट के साथ उलझ गया है योगबल से पूरा सुलझना ही है | मै आत्मा देख रही हूँ, प्रकाश के कार्ब में ये आत्माएँ चमक रही है, मैंने चित्त पर से मैल की पोटली हटाकर उस स्थान पर इन प्रकाशमान (उजली) आत्माओ को रख लिया है, चित्त पर रोशनी फ़ैल गई है | वाह बाबा वाह, अपने चित्त को स्वच्छ कर दिया |”

Sunday, 17 December 2017

नहीं करनी है आदतों की गुलामी





किसी ने ठीक कहा है, आदत वो रस्सा है जिसे मानव अपने हाथो से बांटता है और फिर उसी में बंध भी जाता है | आदत की गुलामी सबसे बड़ी गुलामी है जिससे कोई अन्य मुक्त नहीं कर सकता, स्वयं की लगन और पुरुषार्थ से ही इससे मुक्त हुआ जा सकता है | इस कहानी याद आती है –
एक बार एक राही, जो जंगल से गुजर रहा था, रास्ता भटक गया | रात घिरने लगी तो घबराने लगा पर दूर जलती एक रौशनी को देख उस ओर चल पड़ा | रोशनी  एक घर से आ रही थी, दरवाजा खोलकर वह अन्दर चला गया और एक सुन्दर स्त्री को सोफे पर बैठे देखा | राही ने उसे अपनी परिस्थिति बताई,रात भर ठहरने की अनुमति मांगी और कहा, सुबह अपने रास्ते चला जाऊँगा |
स्त्री ने जवाब दिया, तुम जितने दिन चाहो यहाँ रह सकते हो, तुम्हे अच्छा खाना और आराम मिलेगा, मै सिर्फ प्रतिदिन तुम्हारे शरीर पर एक धागा बधुंगी | रही मान गया, उसे बढ़िया बिस्तर,खाना दिया गया, उसे अच्छा लगा, वह वही रूक गया | रोज बांधा जाने वाला एक-एक धागा वही मजबूत रस्सी बन गया | एक दिन उसका मन हुआ कि मै यहं से चला जाऊ पर वह पुर्णतः बंध चुका था | जब उसने उस औरत का असली चेहरा देखा तो पता चला कि वह एक दायाँ थी जो अपने चंगुल में फंसा कर अनेको का अंत कर चुकी थी, इस राही के जीवन का भी उसने अंत कर दिया | क्या आप जानते है, यह राही कौन है और यह डायन कौन है ? राही है हम सब जो पिता परमात्मा का घर छोड़कर इस स्रष्टि-मंच पर पार्ट बजने आये पर अपने पार्ट द्वारा दूसरो को सुख देने के के लक्ष्य से भटक कर इस दुनिया के जंगल में भटक गए और तब मिली एक सुन्दर स्त्री जिसका नाम है आदत | काम विकार की आदत बना ली, कोई ने क्रोध की , कोई ने लोभ की, कोई ने अहंकार, इर्ष्या,द्वेष , नफरत की आदते बना ली, कोई ने बीड़ी,सिगरेट, तम्बाकू,गुटखा, शराब, तथा अन्य अनेक प्रकार के नाशो की आदत बना ली | शुरू में तो इस सुन्दर स्त्री रुपी आदत के साथ रहना, खाना अच्छा लगा पर जब इससे छूटने की इच्छा पैदा की तो पता चला कि यह केवल ऊपर से सुन्दर पर भीतर से डायन है,इसने हमें पूरी तरह से बाँध लिया है, इसका आदत रुपी धागा, पक्के संस्कार रुपी रस्सी में बदल चुका है | आदत रुपी डायन कइयों के जीवन को प्रतिदिन लील रही है डायन मुक्त करने वाली एक ही शक्ति है और वह है ईश्वरीय शक्ति, जो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय  में राजयोग के अभयस से प्राप्त होती है | इस शक्ति से लाखो लोग इस दायाँ के चंगुल से छुटकर आनंद का जीवन व्यतीत कर रहे है |

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