Tuesday, 28 November 2017

अपने मन से भय को भगाए दूर



                    

हम सभी अपने जीवन में जाने-अनजाने भय से रूबरू होते है | कभी यह ज्ञात का भय होता है तो कभी अज्ञात का | हम अपने भय से निजात पाना चाहते है | भय को भागने के लिए सबसे पहले स्वयं का आत्म विश्लेषण करे कि हमारे दर का कारण क्या है | जब हम अपने दर का कारण समझ जाते है तो हमारे लिए उसका सामना करना आसान हो जाता है |
                         

                       



कई बार अमरे मन का दर अतीत में हुई किसी पुरानी घटना की वजह से भी जन्म लेता है | उदाहरण के लिए, अगर भूतकाल में कभी आपको कुत्ते ने काटा हो तो कुत्ते को देखते ही मन की स्मृति की पुरानी फ़ाइल सामने आ जाती है और भय सताता है | कुछेक बार भय का कारण किसी व्यक्ति से विशेष लगाव हो सकता है जिस कारण उसे खो देने का भय हमें सताता है | दर का कारण भूतकाल में जाने-अनजाने किये गए पापकर्म भी हो सकते है जो वीभत्स रूप में वर्तमान में हमारे सामने आकर हमें डरा रहे हो |
ये हमारे दर ही है जो हमें कमजोर बनाते है | अकेले होने का दर, जोखिम लेने का दर, , कुछ छुट जाने का दर, जिम्मेवारी का दर, असुरक्षा का दर, मृत्यु का दर, सामना करने का दर आदि भय के अन्य अनेक कारण है | जब तक हम इन भयों से पूरी तरह मुक्त नहीं होंगे तब तक हमारा विकास नहीं हो सकता और तब तक हम दूसरो की नजरों में भी अपना खास स्थान नहीं बना पाएंगे |
एक शोध के अनुसार लोगो के 99% दर बेवजह होते है | यदि उनके लिए सही कदम उठाया जाए तो मुक्ति संभव है | स्वामी विवेकानन्द के अनुसार – भय से ही दुःख आता हिया,, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही अनेक बुराइयां उत्पन्न होती है |
                         




अगर हम भय ओ अपने जीवन में स्थान देते है और उसे अपनी जिन्दगी को चलाने देते है तो यह एक भयानक स्थिति बन जाती है जो रोगों को जन्म देती है | यदि हम किसी भी रोग के कारण की खोज करे तो दो ही कारक मिलेंगे --- तनाव और भय |
अस्सी के दशक में एक अपराधी के साथ एक प्रयोग किया गया | उसके सामने एक घोड़े को लाया गया और कहा गया कि यह जैसी मौत मरेगा, वैसे ही आप भी मरेंगे | घोड़े को कोबरा सांप से कटवाया गया, वह तड़प-तड़प कर मर गया | व्यक्ति ये सब ध्यान से देख रहा था | फिर उसकी आँखों पर पट्टी बाँधी गई | उसे कटवाया गया लेकिन कोबरा से नहीं , चूहे से, उसने भी वैसे ही तड़पना शुरू कर दिया | जितने समय में घोड़े ने शरीरी छोड़ा , ठीक उतने ही समय बाद उसने शरीरी छोड़ दिया | हैरानी की बात थी कि जब दोनों के खून की जाँच की गई तो दोनों के शरीर में सामान जहर पाया गया | इससे स्पष्ट है कि भय का शरीर पर किस कदर कुप्रभाव होता है |
चिकित्सकीय खोजो से यह बात सिद्ध हो गई है की मन का शारीरक क्रियाओं पर प्रबल प्रभाव पड़ता है | यदि आपका मन शांत है और विश्वास से भरा है तो यदि आप रोगी भी है तो भी आपके रोगमुक्त होने के पर्याप्त अवसर है किन्तु यदि आपका मन भय अथवा चिंता से ग्रस्त है तो आप स्वस्थ रह ही नहीं सकते | भय न केवल आपको शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी कमजोर बना देता है | जिस पल आप अपने को भयमुक्त बनाने की कोशिश शुरू कर देते है, उसी समय आपकी सेहत दुरुस्त होने लगती है, आपका मन मजबूत बनने लगता है |
वह व्यक्ति जीवन का पहला सबक भी नहीं सिख पाटा जो हर रोज अपने दर को जेट नहीं लेता | किसी ने बहुत अच्छा कहा है ----- भले हम तुफानो से घिरे है पर किनारे पर खड़े उन हजारो लाखो लोगो से अच्छे है जिन्होंने सागर को पार करने की हिम्मत ही नहीं की |
तू रख यकीं बस अपने इरादों पर,
तेरी हार तेरे हौसले से बड़ी तो नहीं होगी |





यदि भय हमारे जीवन को पंगु बनता है और रोगों को जन्म देता है तो आवश्यकता है की हम भय को भगाए | भय के भागते ही आपका सम्पूर्ण व्यक्तित्व रूपांतरित हो जायेगा, आप स्वयं को उर्जावान अनुभव करेंगे तथा दूसरो की नजरो में भी स्वयं के लिए सम्मान का अनुभव करेंगे | प्रश्न उठता है कि भय को कैसे भगाए | भय से भागना नहीं है लेकिन उसे भगाना है | भय पर जीत पाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हु भी के प्रति अपनी सोच को बदले | हम अपना ध्यान संभावित अनिष्ट (नकारात्मक) से हटाकर बलिष्ठ (सकारात्मक) की तरफ लगाये | हर घटना के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलु होते है | कहते है, दूध के फटने से वो लोग उदास हो जाते है, जिन्हें पनीर बनाना नहीं आता | हम सकारात्मक सोच रखे | आत्मछवि सुधारना सहज हो जाएगा |
जिस चीज से दर लगता है, उसका सामना करे | FEAR हमें क्या कहता है – Face Everything  And Rise. अगर हमें स्वयं को ऊँचा उठाना है, आगे बढ़ाना है तो अपने अन्दर के दर से मुक्ति पानी ही होती | दर से पार पाना नामुमकिन नहीं बल्कि बहुत आसान है | बस इसके लिए थोड़ी सी हिम्मत जुटाने की जरूरत है |
मुझे याद है, बचपन में मै बहुत संकोची थी | कक्षा में अध्यापक कोई प्रश्न पूछते तो मै खड़े होकर उत्तर देने में भी हिचकिचाती थी | थी | एक बार स्कूल की प्रार्थना सभा में हमारे हिंदी के अध्यापक ने हिंदी का कोई प्रश्न पूछा, किसी ने हाथ खड़ा नहीं किया | बाद में उन्होंने कहा कि जो विद्यार्थी इस प्रश्न का सही जवाब देगा,मै उसे इनाम दूंगा | मुझे उस प्रश्न का उत्तर आता था लेकिन अपने संकोची स्वभाव तथा इस दर के कारण कि अगर मेरा उत्तर गलत हुआ तो सब मुझ पर हसेंगे, मैंने हाथ खड़ा नहीं किया | हमारे अध्यापक ने कहा कि बड़े दुःख की बात है की किसी को इस प्रश्न का उत्तर नहीं आता | फिर उन्होंने उसका उत्तर बताया , मेरा सोचा गया उत्तर सही था | उस समय मुझे बहुत दुःख हुआ कि  मैंने हाथ क्यों नहीं खड़ा किया | उसी समय मैंने स्वयं से प्रतिज्ञा की कि मै भविष्य में कभी भी संकोच नहीं करुँगी | हर बात में आगे रहूंगी | उसके बात जब भी किसी कार्य को करने के लिए पूछा जाता ,  भले वह कार्य मुझे ना भी आता हो, मै सबसे पहले हाथ खड़ा करती | इस प्रकार अपने भय का मैंने सामना किया और उससे मुक्ति पाई और इससे मुखे आगे बढ़ने में बहुत मदद मिली | मेरे  व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास हुआ |
जीवन में सबसे ज्यादा उदासी से भरे ये शब्द हो सकते है __ काश, मैंने किया होता, मै कर सकता था, मुझे करना चहिये था, मैंने क्यों नहीं किया  |
जीवन में एक भय लोगो का भी होता है | लोग क्या कहेंगे | लोगो के बे से हम सही कार्य को करने से भी डरते है | हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को दबा देते है | किसी ने बहुत अच्छा कहा, है जीवन का सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग | आप चाहे अच्छा करो या बुरा, लोग हर हालत में बोलेंगे ही, इसलिए लोगो के बोलने की चिंता न करके , आपको जो सही लगता है, वहां करे |
           

        


दर को भागने में आध्यात्मिकता बहुत सहायक हो सकती है | आध्यात्मिकता हमें बताती है कि मै कौन हूँ | मै आजम,अमर,अविनाशी चैतन्य आत्मा हूँ, शरीर तो मेरे वस्त्र मात्र है, इस स्मृति से मृत्यु का भय निकल जाता है |
दूसरा, आध्यात्मिकता हमें बताती है कि मेरा कौन है | मेरा सच्चा पिता सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा शिव है जो हर पल मेरे साथ है , वही मेरा सच्चा रक्षक है | यह स्मृति भी भय को भगा देती है | वास्तव में दर विश्वास के विपरीत है | जब हम डरते है तो हम भगवान को यह सन्देश देते है कि हम उस पर विश्वास नहीं करते |
एक गुरु और शिष्य जंगल से होकर गुजर रहे थे | अचानक सामने से शेर आ गया | शिष्य डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया | गुरु वही खड़ा होकर परमात्मा को याद करने लगा | शेर कुछ देर तक तो गुरु को देखता रहा, फिर चुपचाप वापिस चला गया | शेर के जाने के बाद शिष्य थर-थर काँपताहुआ पेड़ से उतरा और फिर दोनों चल पड़े | कुछ दूर जाने इ बाद गुरु की गाल पर एक मच्छर ने काटा | गुरु जोर से चीखा | शिष्य ने पूछा, क्यों महाराज, तब तो शेर के आने पर भी नहीं डरे, अब एक छोटे से मच्छर ने काट लिया तो इतना जोर से चीख रहे हो | गुरु ने कहा, मुर्ख, उस समय तो मै भगवान् के साथ था , अब तेरे साथ हूँ |
इस प्रकार जब हम परमात्मा को साथी बनाते है तो बड़ी से बड़ी मुसीबत भी ताल जाती है | निर्भय बनने में परमात्मा का साथ और स्मृति हमारी बहुत मदद करती है | परमात्मा की स्मृति एक कवच की भांति हर विपरीत परिस्थिति में हमें सुरक्षित रखती है |
तीसरी, आध्यात्मिकता हमें बताती है कि जो हुआ, अच हुआ, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है तथा जो होगा कल्याणकारी है, हर आत्मा अपना पार्ट अच्छी तरह बजा रही है | यह स्मृति भी भय से निजात पाने में मदद करती है | यह स्मृति भी भय से निजात पाने में मदद करती है |
भय को अपना भाग्य मत बनाइये | निर्भीकता में जादू है | इस जादू को अपने जीवन में चलने दीजिये  |

Saturday, 25 November 2017

पशुपतिनाथ की धरती पर परमात्मा शिव



  पशुपतिनाथ की धरती पर परमात्मा शिव


भगवान शिव का एक नाम पशुपतिनाथ भी है | पशु शब्द पाश से बना है | पाश का अर्थ है बंधन | जो पाशों से बंधा हो उसे पशु कहा जाता है | पशु तो स्थूल बन्धनों से बंधा होता है परन्तु मानव आत्मा जब का, क्रोध,लोभ,मोह,आदि सूक्ष्म बन्धनों से जकड़ी जाती है तब उसे इन बन्धनों से मुक्त करने वाले भगवान शिव ही है इसलिए उनका नाम पशुपतिनाथ पड़ गया जिसका अर्थ हुआ पशु की तरह बंधन में बंधी आत्मा को मुक्ति दिलाने वाले स्वामी |

नेपाल में पशुपतिनाथ का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ देश-विदेश के हजारो लोग द र्शनार्थ आते रहते है | मंदिर के गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है | शिवलिंग पर चारो दिशाओं में और ऊपर की तरह भी एक चेहरा निर्मित है जिसका अर्थ है की वे सब ओर से अपने भक्तो को निआल करते है | देहधारी मनुष्य का तो फ्रंट पोज,बैक पोज, साइड पोज अलग-अलग होता है परन्तु भगवान शिव बिदेही होने के नाते उनके सर्व पोज एक सामान ही है | सारा मंदिर चाँदी से मढ़ा हुआ है और शाम की आरती के समय इसके चारो दिशाओं के चारो द्वार खोल दिए जाते है ताकि भक्त लोग सब तरफ से उनसे वरदान ले सके |

मंदिर के मुख्य द्वार के सामें दो नंदिगण स्थापित है | एक बड़े रूप में और एक छोटे रूप में | नंदी का अर्थ है आनंदित करने वाला | भगवान शिव का वाहन बनने वाला कितना भाग्यशाली और सभी के चित्त को हर्षाने वाला होगा ! इसलिए नाम पड़ा नन्दी अथवा भागीरथ (भाग्यशाली रथ) कोई और नहीं, स्वयं प्रजापिता ब्रह्मा ही है | धरती पर ईश्वरीय कर्तव्य की पूर्ति के लिए भगवान शिव को दो मानवीय रथो का आधार लेना पड़ता है इसलिए दो नंदीगणों का स्थापित होना उचित है |

श्री श्री पशुपतिनाथ मंदिर के साथ ही बागमति नदी बहती है जिसके किनारे पर बने ऊँचे मंच पर शाम की आरती का द्रश्य मन को प्रफुल्लित करने वाला होता है | भगवान शिव की महिमा के गीतों से गायक और वादक दिल के तारो को झनझना देते है | इस सजीव संगीतमय वातावरण में हजारो श्रद्धालु ताल के साथ ताल मिलकर झूमते है | अधिक आनंद यह देखकर कि श्रद्धालुओं में अधिकतर 20 से 40 वर्ष की आयु के युवा आया कि भाई-बहने थे | बुजुर्ग बहुत कम थे | युवाओं का यह शिव प्रेम वास्तव में धर्म और संस्कृति का गौरव है | इसी परमात्मा के सत्य परिचय के सम्बन्ध में कुछ उच्चारण करने के लिए कहा गया | पढ़े-लिखे युवा श्रद्धालुओं को देखकर मेरे मन से विचार निकले कि देवनागरी लिपि ‘अ’ से शुरू होकर ‘ज्ञ’ पर ख़त्म होती है जिसका स्पष्ट अर्थ है कि हम अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ते चले | स्वयं को शरीर समझना सबसे बड़ा अज्ञान और स्वयं को आत्मा समझना सबसे बड़ा ज्ञान है |

आरती की समाप्ति पर भेंट स्वरुप मिली रुद्राक्ष माला भी ईश्वरीय प्रेम और कर्तव्य  की स्मृति डोलने वाली रही |

रुद्राक्ष का अर्थ है (रूद्र+अक्ष) भगवान शिव की आंखे अर्थात उनकी आँखों में समाये हुए उनके लाडले बच्चे जो विश्व परिवर्तन के दिव्य कार्य में उनके सहयोगी बनते है | माला को प्राप्त करके भगवान शिव के कर्तव्य को और भी तीव्रगति से आगे बढ़ने और उनकी आँखों का तारा (बहुत प्यारा) बनने का दृढ संकल्प मन में उत्पन्न हुआ |
                  काष्ठ मंडप
नेपाल की राजधानी काठमांडू है | यहाँ एक ही लकड़ी से बने एक परहीं मंदिर का नाम काष्ठ मंडप था, जो 2015 में हए भूकंप के दौरान गिर चूका है | उसी के आधार पर काठमांडू नाम पड़ा है | इस शहर की आबादी लगभग 56 लाख है और यहाँ ब्रह्मकुमारिज की 50 से भी अधिक शाखाएँ सेवारत है | पहाड़ो के बीच की सुन्दर घाटी में बसे काठमांडू शहर को मंदिरों का शहर माना जाता है | इसमें 2000 से भी अधिक मंदिर है |
            विश्वशान्ति पोखरी

शहर के बीचोबीच बहुत ऊंचाई पर स्थित स्वयंभू मंदिर का मुख्य आकर्षण वहां की विश्वशान्ति पोखरी (WORLD PEACE POND) है | इस गोलाकार पोखरी पानी के मध्य महात्मा बुद्ध की कहदी मूर्ति है जिसके वरदानी हाथ से जलधारा निरंतर सामने रखे ग्लोब पर गिरती है | जो मानव के मन से प्रकम्पनो के रूप में सारे विश्व में फैलता है | इस बात को हाथ से निकलती हुई जलधारा के रूप में दर्शाया गया है | परमात्मा पिता कहते है, बच्चे ,आप जितना शांति के संकल्प निर्मित करेंगे और फैलायेंगे उतना विश्व शांति में आपका योगदान जमा योग |
भगवान शिव भाई के रूप में
रानी पोखरी नाम के स्थान पर स्थित शिव-मंदिर साल में एक बार भैया दूज के दिन खुलता है | जिन बहनों के भाई नहीं होते वे उस दिन भगवान शिव को भाई के रूप में तिलक देने वहां जाती है | भगवान शिव संगमयुग में धरती पर आकर माता-पिता , बन्धु,सखा......... आदि सर्व सम्बन्ध मानवात्माओ से निभाते है, यह मंदिर  इसी की यादगार है |
                बूढा नीलकंठ 


प्रजापिता ब्रह्मकुमारिज ईश्वरीय विश्व विद्यालय के संस्थापक पिताश्री  ब्रह्मा बाबा, सन 1937 में उनके तन में परमपिता परमात्मा शिव को प्रवेशता से पहले , जब अपने लौकिक जीवन में थे और हीरे जवाहरात का व्यापार करते थे तब व्यापारिक उद्देश्य से नेपाल आते रहते थे | हर बार वे काठमांडू स्थित बूढा नीलकंठ मंदिर में शेषशैया पर लेटे हए विष्णु जी के दर्शन अवश्य करते थे | अपने भक्तिकाल में वे विष्णु के अनन्य भक्त तो थे परन्तु नारी जाती के प्रति अत्यन्त सम्मान के कारण उन्हें विष्णु जी की वही मुती या छवि प्रिय होती थी जिसमे श्री लक्ष्मी जी उनके पांव ना दबा रही हो | बूढा नीलकंठ मंदिर की मूर्ति ऐसी ही मुती है जिसमे विष्णु जी अकेले ही जल के बीचोबीच शेषशैया पर लेटे हुए दिखाए गए है | परमपिता परमात्मा शिव ने हमें समझाया है कि श्री विष्णु,मानव का सर्वोतम लक्ष्य है | विष्णु समान दिव्य गुणवान बनने के लिए अपने भीतर मौजूद विष (काम,क्रोध आदि विकार) को अणु की तरह अद्रश्य कर देना आवश्यक है |

भारत में जहाँ कन्या-भ्रूण  हत्या एक भयंकर सामजिक समस्या के  रूप में उभर कर सामने आई है और देश के प्रधानमंत्री ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा देकर कन्याओं की सुरक्षा और विकास को सुनिश्चित करने के लिए जनता का आह्वान किया है वही नेपाल में प्राचीन काल से, छोटी कुमारियों को जीवित देवी के रूप में पूजने, उनसे राज कार्य में मार्गदर्शन  और आशीर्वाद लेने की प्रथा देखने को मिली | नेपाल नाल भारत की तुलना में गरीब है | भारत का 1.00 रुपया , नेपाल के एक रुपये 60 पैसे के बराबर है | नेपाल में कन्या-भ्रूण हत्या जैसी समस्या नहीं है |
                    कुमारी पूजा


नेपाल में कुमारी पूजा का प्रारम्भ आज से 1437 वर्ष पूर्व हुआ मन जाता है | लीछवी वंश के राजा गुणकामदेव ने कुमारी कन्या पूजा की धार्मिक प्रथा को विधिवत रूप प्रदान किया | इतिहास में वर्णित है कि बाद में सन 1324 में मल्ल राजाओं ने तुलजा भवानी को अपनी इष्ट देवी के रूप में स्वीकार किया | उनके पास एक शक्तिशाली तांत्रिक यन्त्र था जिससे वे देवी के साथ व्यक्तिगत बातचीत करके राज्य कारोबार के विषय में मार्गदर्शन लेते थे | एक बार राजा त्रैलोक्य मल्ल की सुपुत्री गंगा देवी ने उस यन्त्र को खोला और उसकी झलक ले ली | किसी महिला के द्वारा यह यन्त्र देखना निषेध था | इस कारण देवी ने राजा से कहा,आज के बाद मै आपसे व्यतिगत बातचीत नहीं करुँगी | मै एक कुमारी का रूप धारण करके आपको सलाह देती रहूंगी | आप  शाक्य परिवार में से किसी छोटी कुमारी को चुन इ, ऐसा कहकर देवी अद्रश्य हो गई |

यह माना जाता है कि बच्चे का ह्रदय हर प्रकार की विकृति (क्रोध,धोका, चालाकी, आदि) से मुक्त होता है | तब से शाक्य वंश की एक छोटी कुमारी (3-6 वर्ष) को उसके माता-पिता की अनुमति से जीवित देवी बनाने की प्रथा चलती आ रही है | इस जीवित देवी के 11 वर्ष की होने के बाद नई कुमारी का चुनाव किया जाता है  और उसके देवी बनने की घोषणा महाष्टमी के दिन की जाती है | सन 1757 में देवी कुमारी के लिए अलग घर का निर्माण करवाया गया | इस सम्बन्ध में भी इतिहास में वर्णन आता है कि अंतिम मल्ल राजा , जयप्रकाश मल्ल को श्रीकुमारी स्वप्न में दिखाई दी और कहा, हे राजा, आपका राज्यकाल पूरा होने वाला है परन्तु यदि आप मेरे रहने का एक स्थाई घर बनवाने का और मेरे नाम पर रथ-यात्रा उत्सव शुरू करने की प्रतिज्ञा करे तो मै आपके राज्यकाल को 12 वर्ष तक बढ़ा दूंगी | तब राजा ने कुमारी घर का निर्माण करवाया और एक रथ-यात्रा उत्सव का प्रारम्भ भी करवाया जो अभी तक चलता आ रहा है और देवी के कथन अनुसार राजा ने अगले 12 वर्षो तक राज्य कारोबार को सम्भाला | जो कुमारी देवी रूप का कार्यकाल पूरा कर लेती है उसे नेपाल सरकार, उसकी 21 वर्ष की आयु होने तक 300 रु० प्रतिमास भत्ता देती है | सार रूप में, नेपाल की रक्षा करने वाले अनेक देवी-देवताओं के मध्य श्रीकुमारी भी सबकी रक्षा करने का महत्वपूर्ण रोल अदा करती है | मुझे भी जीवित देवी कुमारी के दर्शनों का सौभाग्य मिला | परमात्मा पिता ने स्रष्टि परिवर्तन के कार्य में पवित्र कुमारियों को निमित्त बनाकर देवी रूप में संसार के सम्मुख उन्हें सम्मनित स्थान दिया | उसकी यादगार रूप में कुमारी पूजन की प्रथा चली आ रही है | नेपाल में कुमारी को देवी रूप में सम्मानित स्थान देकर राजा (वर्तमान समय राष्ट्रपति तथा एनी राजनैतिक नेता और अधिकारीगण) अथवा प्रजा दारा उससे मार्गदर्शन  और आशीर्वाद लेने की प्रथा भी उसी से प्रेरित प्रथ है | आइये,हम कन्या भ्रूण-हत्या को बोझ माने की मानसिकता का त्याग करे और कन्याओं को देवी रूप में सम्मानित पद देकर ईश्वरीय कर्तव्य में मददगार बने |








Saturday, 18 November 2017

धर्म और कर्म का तालमेल


मानव आत्मा जब तक शरीर में है, कर्म से मुक्त नहीं हो सकती | उसमे भी युवावस्था सर्वाधिक कार्यशील अवस्था है | इस अवस्था में उसमे अतिरिक्त शक्ति होती है | यदि इस अतिरिक्त शक्ति का रचनात्मक कार्यों में प्रयोग न किया जाए अथवा युवकों को संतोष,शांति,सद्विचार देने वाला कोई उपाय न अपनाया जाये तो वह अतिरिक्त शक्ति या तो उन्हें बुरी आदतों में दाल देती है या वे उन शक्तियों का दुरूपयोग विध्वंसात्मक गतिविधियों में करते है | अतः कर्म के साथ धर्म अर्थात सद्गुणों की धारणा का संतुलन बाल्यकाल से ही अनिवार्य है | हम कह सकते है कि जब मानव सर्वाधिक कर्मशील हो तब उसका सर्वाधिक धर्मशील होना भी अनिवार्य है |
         
         धर्म कहता है, झुक जाओ 

मान लीजिये, दो गाड़ियाँ आमने-सामने है | दोनों के  चालको को अपने-अपने कार्य की जल्दी है | एक कहता है, तुम पीछे हटो , मै निकलू | दूसरा कहता है, नहीं, तुम थोड़े पीछे हट जाओ, पहले मैं निकल जाता हूँ | इस मै-मै में दोनों अकड़कर खड़े है | दोनों कर्मशील तो है,दोनों को अपने-अपने कार्यो की जल्दी तो है परन्तु दोनों में से एक भी धर्मशील हो अर्थात् धर्म की धारणा वाला हो , गुणों की धारणा वाला हो तो उन दोनों की मै-मै के दौरान दोनों के पीछे की और आ कहदी हुई 100 -100 गाड़ियों का समय भी बाख सकता है | धर्म कहता है, ‘झुक जाओ,बदल जाओ,गलती किसकी है, यह मत खोजो, समाधान कैसे अतीन्द्रिय सुख में झूलता है, झुकना ही जीवित की शान है, अकड़ना मुर्दे की पहचान है, यदि मेरे पीछे हटने से समाधान हो सकता है तो हटने को तैयार हूँ |’

यदि कर्म के साथ धर्म के इन उच्च भावो की धारणा हो तो मिनट में रास्ता साफ़ हो सकता है | जाम में फंसे विद्यार्थी,बीमार,ट्रेन या हवाई जहाज पकड़ने वाले यात्रीगण--- सभी लक्ष्य तक पहुँच सकते है परन्तु कोरे कर्मशील बनकर , धर्म को कर्म से जुदा करने से हम अनजाने में अपने और दुसरे के कर्मो को बाधित करते रहते है | इस धर्म को अर्थात् नम्रता को यदि वृद्धावस्था में धारण कर भी लेंगे तो उससे समाज को क्या फायदा होगा, इसकी जरुरत तो तब थी जब हम कार्यशील थे |

गुणों की धारणा ऊपर है या जीभ का स्वाद

भोजन खाना एक कर्म है पर इस कर्म के साथ धर्म अर्थात् इस धारणा का तालमेंल चाहिए कि मै ऐसा कुछ भी ना खाऊं जो दुसरे को पीड़ा दे | हमें देखना है की जीभ का स्वाद ऊपर है या गुणों की धारणा ऊपर है | कई लोग इसी स्वाद के वश पशु-हत्या करते है या करवाते है और तर्क देते है कि संसार का नियम है, एक प्राणी , दुसरे प्राणी को मारकर ही जिन्दा रह सकता है जैसे कि शेर यदि ना मारे तो खुद भूखा मर जाए, छिपकली,मेढ़क सभी अपने को जिन्दा इसी आधार पर रखते है | मानव की बुद्धिमानी देखिये, यदि उसे कहा जाये,ठीक है, तुम कहरे में शेर की नक़ल कर रहे हो तो वह तो जंगल में बिना बिछाये, ओढे जीवन गुजर कर लेता है, स्कूल नहीं जाता.......तुम भी उसकी तरह जंगल में रहो, खाओ , तब वह कहेगा , मै कोई जानवर हूँ क्या ? मै तो जानवरों से श्रेष्ठ हूँ, मुझे सभी  तरीके से रहने का हक़ है | इसका अर्थ है केवल कहते वक्त जानवर बनना चाहता है, शेष  समय नहीं |
           
         बढती अमर्यादा और घटती आयु

जानवरों में कोई मर्यादित रिश्ते नहीं होते | कोई माँ, बहन, बेटी नहीं होती | उनकी वंशवृद्धि  में किसी जाति, कुल, गोत्र की सीमाए,आयु या वर्ग का प्रश्न नहीं होता | ऐसे अमर्यादित जानवर का खून मानव को नहीं चदता, चड़ना तो माँस भी नहीं चाहिए पर जबरदस्ती चढ़ा लेता है, फिर परिणाम क्या सामने आ रहे है ? अमर्यादित  संस्कार भी पनपते जा रहे है, वह भी माँ, बहन,बेटी की मर्यादाओं को तिलांजली देकर स्वेच्छाचारी बन रहा है | जिन जानवरों का मांस  खता है उनकी आयु मानव की भेंट में बहुत कम होती है | जब  कम आयु वाली सेल (कोशिकाएँ) उसके शरीर में जायेंगी तो आयु तो कम होगी ही | अकालमृत्यु  के बहुत सारे कारणों में एक कारण यह भी है, हम दुसरो को मारकर अपनी भी जीने की घड़ियों को घटाते जा रहे है | अतः हम खाएं परन्तु दया, सहिष्णुता, सहानुभूति, धैर्य, स्वच्छता,संयम आदि गुणों की धारणा को साथ लेकर खाएं | कर्म और धर्म के इस तालमेल से स्वास्थ्य भी और आपसी सम्बन्ध भी सुखदाई  रहेंगे |
  
      दूसरो को ना  देख अपना प्रबन्ध करे 

सद्गुणों की धारणा ही धर्म है और अवगुणों को अपनाना ही अधर्म है | जब किसी को कहा जाता है कि आत्मा को गुणवान बनाओं, अवगुणों से उसे मैला मत करो तो बहुत- से लोगो का उत्तर होता है कि आज का माहौल ऐसा है कि ना चाहते भी अवगुण अन्दर चले जाते है | दूसरो की बुरी बातो का, ना चाहते भी असर आ ही जाता है, क्या करे ? विचार कीजिये, हम कही जा रहे है और रास्ते में गन्दा नाला होने के कारण या किसी पशु के मृत शरीर के पड़ा होने के कारण बहुत ही गन्दी बदबू चारो ओर फैली हुई है | हम तुरन्त रुमाल निकलकर नाक पर रख लेते है ताकि बदबू को फेफड़ो में जाने से रोक सके | यहाँ हम इंतजार नहीं करते कि दुसरे ने रुमाल निकाला या नहीं हमें तो बस यह रहता है की हमें तुरंत बदबू भी तो बड़ी भयंकर है. हम दूसरो को ना देख, अपना प्रबन्ध करे कि कोई अवगुण हमारे अन्दर ना आ जाये | जैसे बदबू शरीर को बीमार कर देती है, ईसिस प्रकार अवगुणों की बदबू आत्मा को बीमार कर देती है | सफल वही होता है जो दूसरो को न देख, अपने मार्ग पर चलता रहता है | ऊँचे चरित्र वाला यदि हमें आस-पास या दूर-दूर तक कोई नहीं दखाई दे रहा, तो भी हमें अपने लक्ष्य पर अडिग रहना है, क्योंकि यह भगवान का आदेश है |

कर्म करते गुणों का श्रंगार न भूले 

लौकिक पढाई में विद्यार्थियो की परीक्षा के पेपर जब चेक किये जाते है तो परीक्षक दो बाते देखता है, एक विषय के अनुरूप कितना लिखा हुआ है ? दूसरा,लिखाई कैसी है ? कई विद्यार्थियों की विषयवस्तु तो बहुत अच्छी होती है पर लिखी साफ़ न होने के कारण नम्बर कट जाते है | इसी प्रकार कई विद्यार्थी ऐसे होते है कि उनकी लिखाई तो अच्छी होती है परन्तु विषयवस्तु कमजोर होती है , तो भी नम्बर कट जाते है | अधिकतम नम्बर उसी को मिलते है जिसकी दोनों चीजे अच्छी हो | मानव का धर्म अर्थात धारणा  (सत्य,प्रेम,पवित्रता,दया,........) का पहलु तो बहुत ऊँचा हो पर वो कर्म ठीक ना करे या बिलकुल भी ना करे या कर्म में दूसरो पर आधारित रहे तो उसके भी नम्बर कट जाते है और यदि कोई कर्म खूब करे पर कर्म करते गुणों की धारणा भूल जाए तो भी उसके नंबर कट जाते है | पुरे नंबर तभी  मिलते है जब कर्म करते हुए गुणों की धारणा को बनाये रखा जाए | कर्म की जल्दबाजी में धर्म को अर्थात गुणों के श्रंगार को भूलना नहीं चाहिए |
कूलर में भी दो आप्शन होते है, एक हवा का और दूसरा पानी का | हम चाहे तो केवल हवा ले और चाहे तो हवा के साथ पानी की ठंडक भी अनुभव करे | जब हवा के साथ पानी की ठण्डक मिल जाती है तो गर्मी में ज्यादा आरामदायक लगती है | इसी प्रकार कर्म करके हम मानव को सुख देते है परन्तु उस कर्म में यदि गुणों का समावेश हो जाए तो बुराइयों से तपते मानव को अधिक आराम महसूस होता है | जीवन में कर्म के साथ धर्म को जोधने से वह अधिक उज्ज्वल बन जाता है |
शिव भगवानुवाच :- “आजकल की दुनिया में धर्म और कर्म – दोनों ही विशेष गाये जाते है | धर्म और कर्म  - ये दोनों ही आवश्यक है लेकिन आजकल धर्म वाले अलग , कर्म वाल्व अलग हो गए है | कर्म वाले कहते है कि धर्म  की बाते नहीं करो , कर्म करो और धर्म वाले कहते है कि हम तो है ही कर्म-सन्यासी | लेकिन संगम पर ‘धर्म और कर्म’ को इकठ्ठा करते है | धर्म का अर्थ है दिव्य गुण धारण करना चाहे कैसी भी जिम्मेवारी का कर्म हो, स्थूल कर्म हो,साधारण कर्म हो या बुद्धि लगाने का कर्म हो लेकिन हर कहावत है कि ‘एक म्यान में दो तलवारे नहीं रह सकती’ अथवा ‘एक हाथ में दो लड्डू नहीं आते’ लेकिन संगम पर असंभव बात संभव हो जाती है | यहाँ एक ही समय पर ‘धर्म भी हो और कर्म भी हो’ – इसका ही अभ्यास सिखलाते है | कर्म में यदि धर्म कम्बाइंड नहीं तो साधारण कर्म रह गया न इसलिए हर कर्म में धर्म का रस भरना चाहिए | यह चेक करना पड़े कि धर्म को किनारे कर कर्म कर रहे है अथवा धर्म के समय कर्म को किनारे तो नहीं कर देते है ? धर्म को छोड़ कर्म में लग गए, यह भी निवृति मार्ग हो गया | तो सदा प्रवृति  मार्ग रहे | ऐसा अभ्यास जब सबका सम्पन्न हो जाए तब समय भी संपन्न हो” |


Wednesday, 15 November 2017

बच्चे करते है अनुकरण माता-पिता का



दुनिया में प्रत्येक माता-पिता का ये सपना होता है कि उनकी संतान सुयोग्य , सुशिक्षित ,संस्कारी व् आज्ञाकारी हो | इसके लिए उनका सदा यही प्रयास रहता है कि वे अपने बचो को श्रेष्ठ संस्कारो की पूँजी ही विरासत में दे | नि:संदेह दुनिया में अगर परमपिता परमात्मा के पश्चात् किसी का स्थान है तो वह माता-पिता का ही है | माता-पिता के प्यार, त्याग और पालना को कोई भी शब्दों में बयान नहीं कर सकता है लेकिन आजकल बच्चे माता-पिता के सपने पुरे करने में सक्षम नहीं हो पा रहे, कारण क्या है ?

      माता-पिता पूछे स्वयं से एक सवाल

मेरा सर्व माताओं-पिताओं से विनम्र निवेदन है कि एक बार सच्चे दिल से स्वयं से पूछे, हम जैसा अपने बच्चो को बनाना चाहते है, क्या हम स्वयं वैसे है ? माता-पिता चाहते है कि उनकी संतान सदा सत्य बोले पर वे स्वयं से पूछे, क्या हम स्वयं सदा सत्य की राह पर चलते है ? माता पिता उनसे क्या चाहते है परन्तु माता-पिता जो करते है, बच्चे फालो अवश्य करते है |

           बने अच्छे इन्सान

मै कही भी जाता हूँ – चाहे स्कूल में, सम्बन्धियों के पास, दोस्तों के पास, सभी मेरे शांत स्वभाव और अनुशासन से बेहत\द प्रभावित होते है | दिल की गहराइयों से मै इसका श्रेय परमपिता परमात्मा व् अपने माता-पिता को देता हूँ | मेरी मम्मा सदा यही कहती है, आप भले ही एक अच्छे डॉक्टर,वकील, इंजीनियर.......न  बने पर एक अच्छे इन्सान अवश्य बने | इसके लिए उन्होंने मेरा दाखिला, जब मै मात्र ढाई वर्ष का था , एक अदभुत विद्यालया में करवाया जिसका नाम है,प्रजापिता ब्रह्मकुमारिज ईश्वरीय विश्व विद्यालया | यहाँ नैतिक मूल्यों व् राजयोग की शिक्षा हर आयु के बच्चो को नि:शुल्क दी जाती है | इस विद्यालय

में दो वर्ष का बच्चा भी जा सकता है तो 80 वर्ष का भी क्योंकि परमपिता परमात्मा तो सबके पिता है | वहां मै प्रतिदिन मात्र एक घंटा सहज राजयोग की शिक्षा लेता हूँ |

      एक घन्टे के बदले अमूल्य प्राप्तियाँ

मेरी मम्मा कहती है, अपने बच्चो को अच्छा इन्सान बनाने के लिए मुझे भी तो अच्छा बनना होगा | इसलिए बे भी मेरे साथ प्रतिदिन सुबह, मेरे स्कूल के समय से एक घंटा पहले,इस विश्व विद्यालय में जाती है | आयु छोटी होने की वजह से शुरू में मुझे भले ही ज्ञान समझ में नहीं आता था पर वहां का सात्विक और दिव्य वातावरण बेहद प्रभावित करता था | धीरे-धीरे ज्ञान की सभी बाते मुझे अच्छी तरह समझ में आने लगी और प्रदीन राजयोग का अभ्यास करने से ज्ञान को स्वयं में धारण करने की शक्ति आने लगी | मै कभी स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था की प्रतिदिन मात्र एक घंटा देने से मुझे जिन्दगी के हर क्षेत्र में इतनी अधिक अमूल्य प्राप्तियाँ होगी |

           स्वयं को समय देने के फायदे

वास्तविकता तो यह है कि आज हम भौतिक साधनों, सुविधाओं के पीछे इतने अधिक दौड़ रहे है कि हमारे पास स्वयं के लिए समय ही नहीं है | इसी वजह से सच्चा सुख कही खो गया | अगर माता-पिता चाहते है की हम बच्चो को नैतिक मूल्य विरासत में दे तो कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ेगा ही ! पर इतनी बड़ी प्राप्ति के लिए अगर अपने व्यस्त समय में से मात्र एक घंटे का समय निकलने की कीमत देनी पड़े तो यह कितनी छोटी-सी कीमत है | जब हम आध्यात्मिक ज्ञान व राजयोग कि ओर अग्रसर होते है तो हम स्वयं के लिए समय देते है जिससे स्वयं कि कमी, कमजोरियों को जान पाते है | हमारा सम्बन्ध परमपिता परमात्मा से जुड़ जाता है , जो गुण व शक्तियों के सागर है | इससे हमारे अन्दर भी गुण व शक्तियाँ आने लगती है | जब हम स्वयं गुणों से भरपूर होंगे तो दुसरो तक वे अपने आप पहुँच जायेंगे | मेरे पास मेरा अपने कुछ भी नहीं है , सब परमपिता परमात्मा निराकार शिव बाबा का दिया हुआ है इसलिए जब भी कोई मेरे किसी भजी गुण की तारीफ़ करता है तो मेरे नयन परमात्मा के प्यार से भर जाते है | मै तहेदिल से चाहता हूँ कि सब उस गुणों के, प्यार के सागर से भरपूर हो | अनुभव लिखने का मेरा लक्ष्य भी यही है कि सब परमपिता परमात्मा के निस्वार्थ प्यार के अनुभवी बने | उनके गुण व शक्तियों के अधिकारी बने |

 

 

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