Sunday, 29 October 2017

सर्वागीण मेकप



                 

रीर का सुन्दर और स्वस्थ होना एक बहुत बड़ी नेमत है | मंदिरों में जिन देवी –देवताओ के दर्शनों के लिए भीड़ उमड़ती है उनकी आंतरिक दिव्यता के साथ उनका सुन्दर शरीर भी आकर्षण का केंद्र होता है | अतः देवताओं का वंशज मानव भी अपने को सुन्दर बनाना चाहता है और इसके लिए वह मेकप का सहारा लेता है |
                        
                      



मेकप (Meke-up) का अर्थ होता है कमी को पूरा करना | यदि किसी की आंख की सुन्दरता में कोई कमी है तो वह बनावटी साधनों के द्वारा आँखों को सुन्दर बना सकता है | होठो की सुन्दरता में कमी है तो बनावटी लेप लगाकर उन्हें सुंदर बना सकता है | सम्पूर्ण चेहरे की सुन्दरता को बढ़ाने वाली भी कई प्रकार के लेप बाज़ार में मिलते है | इसी प्रकार हाथों , पावों , उंगलियों की सुन्दरता भी बढाई जा सकती है |
                
           



कमी केवल बाह्म इन्द्रीयों और चेहरे में ही नहीं होती जिनका मेकप करके हम सर्वाग सुन्दर बन जाएँ | कई बार शरीर को निर्मित करने वाले विभिन्न तत्वों में भी कमी आ जाती है | उनका भी मेकप होना चाहिए | आँख , नाक, होठ कितने भी सजे हुए ह पर यदि शरीर में खून की कमी है तो चेहरे का पीलापन सारा मेकप बिगाड़ देता है | यदि शरीर की हड्डियाँ, त्वचा के बाहर झांक रही हो तो भी चेहरे का सारा मेकप फीका पड़ जाता है | अतः बाहरी मेकप के साथ-साथ शरीर के भीतर तत्वों को संतुलित मात्रा में बनाये रखना , उनकी कमी ना होने देना भी जरुरी है |
                   
             

जन्म के समय शरीर की लम्बाई और मोटाईमें एक संतुलन होता है परन्तु बाद में कई बार बिगड़ने लगता है | कभी पेट बहार निकल आता है और कभी बहुत अन्दर चला जाता है | दोनों आवस्थाओं  में मेकप की जरुरत है | संतुलित शारीरक आकार, चेहरे की सुन्दरता की कमी पूरी कर सकता है | अतः बढ़े हुए मोटापे को कम करना या अति दुबलेपन को दूर करना, यह भी मेकप का एक हिस्सा है |
                      
                       



उपरोक्त तीनो पहलुओं के साथ-साथ मेकप का एक चौथा पहलु भी है और वह है आत्मिक गुणों का मेकप | मान लीजिए , किसी व्यक्ति ने चेहरे को, शरीर को बहुत सुन्दर सजा लिया पर अन्दर में क्रोध का ज्वार है जिसकी भंगिमा चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रही है | क्या क्रोध से भरा चेहरा सुन्दर लग सकता है ? हमने बाहर मेकप किया, बाहरी कमी को पूरा किया पर अन्दर जो शांति की, धैर्य की, प्रेम की,पवित्रता की, सहनशीलता की कमी है इसे पूरा किये बिना सुन्दरता अधूरी है |
          
     



क्रोध क्या है, क्यों आता है ? क्रोध , बिना प्रयास किये,बिना मेहनत किए तुरंत प्राप्ति करने की प्रवृति का नाम है, कैसे ? एक मालिक के घर जोकर नया आया है | उसे मालिक के कार्यालय की सफाई का काम दिया गया है | नौकर द्वारा साफ किये कमरे को देख मालिक खुश होने के बजाये आग बबूला हो रहा है की तुमको कुछ नहीं आता | माना की उसे कुछ नहीं आता तो उसे सिखाने में समय और मानसिक उर्जा लगाइए | हम ये दोनों नहीं लगाना चाहते पर कार्य एकदम बढ़िया चाहते है | हम समय न लगाकर क्रोध द्वारा उसे मिनट मोटर में हुआ देखना चाहते है , इस प्रवृति का नाम है क्रोध |
             
                  


 एक शांतिप्रिय व्यक्ति अपने सामने आने वाली प्रतिकूल बातो, परिस्थितियों और व्यक्तियो को देखकर सोचता है की इन्हें पार करने के लिए मै आंतरिक बल, शुभभावना के बल और सहनशीलता के बल का प्रयोग करूँ | भले ही इसमें मुझे थोड़ा समय लगेगा परन्तु मेरा सकरात्मक विचार सामने वाले व्यक्ति में भी और परिस्थिति में भी बदलाव लाकर स्नेह , सदभाव और समायोजन का रास्ता अवश्य निकालेगा | इसके विपरीत, क्रोध को बल के रूप में प्रयोग करने वाला व्यक्ति प्रतिकूलताओं को – आग बबूला होकर, नकारात्मक शब्द, अपशब्द बोलकर , भय दिखारकर, धमकी देकर, मिनट मोटर में अनुकूल बना लेना चाहता है | वह बिना मेहनत किये और धैर्य रखे दुसरो के बदलाव रुपी फल को पाना चाहता है जैसे की एक चोर बिना कमाए ही धन को पा लेना चाहता है |
             
           
                 
 
एक चोर किसी दुकान में घुसकर तिजोरी  से 50 हजार चुरा लेता है और सोचता है , दुसरो लोग पैसे पाने के लिए यूँ ही महीने भर मेहनत और इंतजार करते है, मैंने तो बिना मेहनत, बिना इंतजार तुरंत पासे पा लिए | लेकिन वह समाज से मुहं चिपटा फिरता है | पुलिस के भय में खाता है, भय में सोता है, कुसंग से घिरा रहता और ‘चोरी का धन मोरी में’ इस कहावत के अनुसार, उस धन को भी निरर्थक कार्यो में उड़ा देता है | क्रोध भी एक प्रकार की चोरी है | इसे हमने शैतान (रावण) से चुराया है | हम सब मूल रूप में परमात्मा शिव की संतान शांत स्वरूप आत्माएँ है | हमारी मूल दौलत शांति है | क्रोध तो रावण की सम्पति है जिसे जाने-अनजाने हमने अपना मान लिया है |
                   
              
किसी एनी की चीज हमारे हाथ में देखकर कोई टोक दे की यह चीज आपने चुराई है क्या ? तो हमें बुरा लगता है , हम उसे छिपाने की कोशिश करते है या उसके बारे में झूठे तर्क देकर सिद्ध करते है की यह चोरी की नहीं, मेरी है | इसी प्रकार कोई हमें क्रोध करते देख ले या कभी हमें का दे , आपको तो क्रोध बहुत आता है, मैंने अमुक दिन आपको लाल-पीला हुआ देखा था, तो क्या हम मान लेते है कि हाँ, मै क्रोधी हूँ ? नहीं ना | तब तो हम ‘बात ही ऐसी थी , उसे ठीक करने के लिए क्रोध न चाहते भी करना पड़ा आदि-आदि तर्क देकर अपने को ठीक सिद्ध करने की कोशिश करते है | अगर हमें हमारे क्रोध पर गर्व होता तो हम शान से कहते की हाँ, मुझमे क्रोध है पर अंतरात्मा जानती है की यह गर्व की नहीं बल्कि शर्म की बात है की हमने शैतान की वृत्ति को चुराकर उसका काफी स्टॉक अपने भीतर छिपा रखा है और जरुरत पड़ने पर चोरी-छिपे उस स्टॉक का प्रयोग भी करते है पर साथ ही यह ध्यान भी रखते है की कोई देख न ले और क्रोधी कह न दे |
   

क्रोध के अलावा रो भी तो कई विकार है जिनके रहते मेकप पूर्ण नहीं माना जा सकता | व्यक्ति कितना भी श्रंगारित हो, महंगे लिबास में हो पर यदि अहंकार की गिरफ्त में है तो अकेला पड़ जायेगा | सुन्दरता पर अहंकार का ग्रहण लग जाएगा | इर्ष्या,घ्रणा रुपी भीतर की कुरूपता , बाहर के सौन्दर्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देगी | ये सभी विकार आत्मा के भीतर मूल सात गुणों (ज्ञान,पवित्रता,शांति,प्रेम,सुख,आनंद,शक्ति) की कमी के कारण उत्पन्न होते है | मेकप सम्पूर्ण तब हो जब इन मूल गुणों में आई कमी को पूरा किया जाये | हम देखते है की एक छोटे बच्चे में ये सातों गुण स्वाभाविक होते है | वह बिना बाहरी सजावट के भी सभी को आकर्षित करता है | उसकी आँखों से मासूमियत झलकती है, वाणी से सरलता , चेहरे से  निष्कपट मुस्कान और कर्मो में निश्चिन्तता होती है | पर ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, इन आंतरिक गुणों से दुरी बना लेता है और कपड़ो , बालो जूतों आदि से सुन्दरता का निर्माण करने की कोशिश करता है , फिर भी बाल्यावस्था जैसी दिल को लुभाने वाली सुन्दरता नहीं बन पाता |
          

दिल को लुभाने वाली सुन्दरता का डाटा है दिलाराम | दिलाराम अर्थात सभी के दिलो को आराम देने वाला परमपिता परमात्मा शिव | शिव | उन्हें सत्यम शिवम् सुन्दरम् कहा जाता है | इसका अर्थ है वे परमसत्य है, परमकल्याणकारी है और परमसुन्दर है परन्तु उनके पास शरीरी तो है ही नहीं फिर उनके पास कौन-सी सुन्दरता है ? अशरीरी परमात्मा पिता के पास गुणों की सुन्दरता है, वे गुणों के भंडार है | शांति,प्रेम,आनंद आदि सभी गुणों के वे सागर है | अपनी इसी सुन्दरता के संग का रंग लगाकर उन्होंने देवताओं को सर्वागीणरूप से सुन्दर बनाया है | हम आत्मा भी मन बुद्धि को एकाग्र करके परमधाम में उनके सम्मुख स्थिर हो जाएँ तो उनकी दुआ भरी किरने हमें हमारे मूलगुणों से भरपूर कर देंगी | जैसे पार्लर में जाने वाला, ब्यूटीशियन (सौन्दर्य-प्रसाधक) के समक्ष स्थिर होकर बैठ जाता है, बाकी सारे कार्य वह ब्यूटीशियन स्वयं कर लेता है | इसी प्रकार परमात्मा पिता भी सुप्रीम ब्यूटीशियन है | हमें हमारे मन-बुद्धि को उनके सामने समर्पित करना है , शेष सजाने, श्रंगारने का कार्य वे स्वयं कर लेंगे |
   
             ➤OM SHANTI➤

Thursday, 26 October 2017

शिक्षा की ओर बढ़ते कदम



           


जब महान दार्शनिक और शिक्षाविद सुकरात ने लोगो को बौद्धिक रूप से शिक्षित करने के लिए अपनी संस्था ‘एकेडमी’ खोली होगी तो उनके मन में ख्याल भी नहीं रहा होगा की एक दिन ये शिक्षण संस्थान सबसे अधिक आर्थिक लाभ देने वाले करमुकत टैक्स फ्री उधोग में बदल जायेंगे और शिक्षा व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बनकर रह जायेगी | परन्तु वर्तमान समय में यह सब कुछ हो रहा है |
                  
              


क्या शिक्षण संस्थाओ का मूल्य यही है की वे डिग्री/सर्टिफिकेट देकर व्यक्ति को लिपिक (क्लर्क) बनाने या धन कमाने के लिए सड़क पर छोड़ दे ? आखिर विद्यालय के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान है जहाँ एक बालक को बेहतर इन्सान बनाने के लिए मानवीय मूल्यों की शिक्षा देने का प्रावधान हो ? विद्यालयों में शिक्षा के गिरते स्तर से सरकार और शिक्षाविद सभी चिंतित तो दिखाई पड़ते है परन्तु मूल्य शिक्षा को लागु करने के प्रति संकोच का भाव क्यों है ? यह बात तो सभी स्वीकार करते है की वर्मान समय में विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करके निकलने वाले विद्यार्थियों में मानवीय मूल्यों जैसे शांति, सहनशीलता , प्रेम, सेवाभाव, सहयोग इत्यादि की निरंतर कमी होती जा रही है | आज के शिक्षित बच्चो के कंधो पर ही कल के समाज का उत्तरदायित्व है | जब उनमें मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओ का आभाव रहेगा तो उनसे यह कैसे आशा की जा सकती है की वे सामजिक और पारिवारिक कर्तव्यो के प्रति निष्ठावान बने ? संवेदनशून्य  व्यक्ति से कर्तव्य –बोध की आशा नहीं की जा सकती है |
                           
                  



सामाज के बुद्धिजीवी लोगो को वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मूल्यों को लागू करने के लिए सकरात्मक माहौल बनाने में आगे आना चाहिए | मिडिया और समाचार –पत्र  भी मूल्यों को शिक्षा में लागू करने की आवश्यकता के प्रचार-प्रसार में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते है | उच्च शिक्षा के लिए पुरे देश में उत्तरदायी विश्वविद्यालय अनुदार आयोग मूल्य शिक्षा के महत्त्व को बहुत पहले ही रेखांकित कर चूका है | इसे सन्दर्भ में शिक्षा शास्त्रियो और सरकार में एक जैसी ही सहमती है परन्तु अब तक मूल्य शिक्षा को बच्चो के फैसला नहीं ले सकी है | वास्तव में वर्तमान समय राजनीति और राजनीतिज्ञ मूल्यों से भटकाव के दौर से गुजर रहे है जबकि शिक्षा का मानवीकरण करने के लिए लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है |
                         

                    

अगर भारत को विश्व-गुरु जैसे सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित करना है तो मूल्य शिक्षा के बिना यह केवल दिवास्वप्न है क्योंकि कोई भी राष्ट्र केवल धन-दौलत और भौतिक संसाधनों के बल पर वैश्विक नेतृत्व नहीं कर सकता है | योग्य , चरित्रवां,कर्तव्यनिष्ठ और इमानदार नागरिक ही किसी राष्ट्र के महँ बनने की पटकथा की प्रष्ठभूमि की रचना करते है और केवल मूल्य शिक्षा ही इस प्रकार के नागरिको को तैयार करने में सक्षम है | वर्तमान समय शिक्षा  में भौतिकवादी दर्शन के तत्व की प्रध्नता हो गई है | विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक , तीनो ही ज्ञानार्जन के बजाये धनार्जन से अधिक प्रभावित है | यदि विद्यार्थी को नौकरी नहीं मिलती है तो वह अपने जीवन को व्यर्थ मानकर कुण्ठा और हताशा के सागर में डूब जाता है | यदि वर्तमान शिक्षा प्रणाली से युवा पीढ़ी की इअसी फौज तैयार हो रही है तो यह बहुत बड़ी राष्ट्रीय क्षति है यहाँ यह समझना और समझाना आवश्यक है की नौकरी न मिलने से शिक्षा और जीवन व्यर्थ नहीं जाते है | जीवन में यदि धन कमाना आवश्यक ही है तो अन्य कई तरीके भी है लेकिन जीवन की सार्थकता धन कमाने से बहुत ऊँची है |
        


वर्तमान समय के पाठ्यक्रमो की प्राथमिकता देखकर तो यही लगता है की यह संसार व्यापारिक केंद्र है और मनुष्य उपभोक्ता से अधिक कुछ भी नहीं है और मनुष्य के जीवन का उद्देश्य वस्तुओ का का उत्पादन और विपरणन मात्र रह गया है | आधुनिक काल में बिजनेस-स्कूल को अच्छी निगाहों से देखा जाता है और जो बिजनेस – स्कूल वस्तुओ को बेचने वाले कुशल प्रबंधको को तैयार करता है, उसकी चर्चा चारो ओर होती है | लोग ऐसे स्कूल में प्रवेश के लिए लालायित रहते है तथा मुंहमांगी फ़ीस देने में भी संकोच नहीं करते है | पुनः वही प्रश्न सोचने को मजबूर करता है की क्या विद्यालयों की स्थापना मात्र वस्तुओ को खरीदने और बेचने की पढाई करने के लिए है ? फिर समाज को अच्छा बनाने वाले इन्सान कहाँ से आयेंगे ? क्या मनुष्य का जीवन केवल धन-दौलत से सुखी हो सकेगा ? आखिर हम मनुष्य के अन्दर श्रेष्ठ विचार , संस्कार और मूल्यों को जागृत करने के बारे में कब सोचना प्रारम्भ करेंगे ? आज मनुष्य के जीवन में दुःख , चिंता , निराशा, हताशा , की वृद्धि से संसार में हिंसा, आतंक,भ्रष्टाचार, अपराध बढ़ते जा रहे है | क्या यह संसार सुखमय जीवन के लिए सुरक्षित जगह रह गया है ? यदि इसका उत्तर ‘नहीं’ है तो तुरंत ऐसी शिक्षा की पहल करने की आवश्यकता है जो समाज के लिए चरित्रवान और ईमानदार नागरिक तैयार कर सके | केवल वही शिक्षा इस प्रयास में सफल हो सकती है जो विद्यार्थियो को आत्म-अनुभूति कराकर उन्हें जीवन के व्यापक उद्देश्य से जोड़े | साथ ही विद्यार्थियो को यह भी समझा सके की एक बेईमान प्रबंधक और प्रशासक की तुलना में एक चरित्रवान प्रबन्धक और प्रशासक समाज के लिए महत्वपूर्ण है | यह आत्मभाव विद्यार्थियो में जागृत करना बहुत ही आवश्यक है तब ही वर्तमान संसार की अवस्था और व्यवस्था का सुधार संभव है |
                     
            


हम जिस प्रकार के शैक्षिक दर्शन के आधार पर विद्यार्थियों को शिक्षित करते है, उसी प्रकार के कल के समाज के कर्णधार तैयार होते है | उसी प्रकार के कल के आतंक,भ्रष्टाचार आदि के लिए कोई दैवी सत्ता या समय दोषी नहीं है | सभी बुरइयो के लिए समय या व्यवस्था को दोषी ठहरा देना बहुत आसान होता है परन्तु समय की रचना कौन करता है ? स्वयं मनुष्य या कोई ईश्वरीय सत्ता ? अपने खाने-पीने, सोने सोचने राणे , करने इत्यादि क्रियाओ के लिए समय का निर्धारण मनुष्य स्वयं करता है | आवश्यकता उपर्युक्त क्रियाओ के चयन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका विभाति है परन्तु कोई अद्रश्य सत्ता इसमें हस्तक्षेप नहीं करती है | यदि समय अपराध के लिए दोषी होता तो एक ही समय सर्वत्र एक सामान ही अपराध होते परन्तु ऐसा नहीं है | वास्तव में समाज या संसार की अवस्था और व्यवस्था मनुष्य के संकल्प और कर्म से संचालित होती है | जिस देश में जिस प्रकार के मूल्यों का शिक्षा व्यवस्था में समावेश होता है, उसी प्रकार का आचरण वहां के नागरिको द्वारा किया जाता है | वर्तमान समय में इस विश्व में कई ऐसे देश है जहाँ हत्या जैसे अपराध होते ही नहीं है अथवा नगण्य है | उदाहरण के तौर पर मारिशस देश में जेब कटने  जैसी छोटी –मोटीघटनाये मात्र होती है |

                       
जिन देशो में धन कमाने और वस्तुओं के संग्रह और उपभोग की प्रवत्ति से शिक्षा प्रणाली का दर्शन प्रभावित है , प्रायः उन देशो में धन, अपराध की मुख्य केन्द्रीय प्रवत्ति बन गया है | इन देशो में मनुष्य के कर्म, व्यवहार और क्रियाएं व्यापर में बदल गए है | ऐसे समाज में हानि और लाभ पहले तय कर लिए जाते है और बाद में उसके अनुसार ही मानवीय सम्बन्धो की रूपरेखा तय की जाती है | ऐसे समाज में सलाह देने तक की कीमत वसूली जाती है | इसलिए बच्चो के लिए पाठ्यक्रम बनाते समय मानवीय मुल्यों का समावेश करना बहुत ही आवश्यक है अन्यथा आने वाले समय में घर हमारे लिए इस धरती पर शांति और सुकून की अनुभूति का सबसे सुरक्षित स्थान नहीं रह जायेगा | परिवार केवल आवश्यकताओ को पूरा करने वाले विनिमय केंद्र बनकर रह जायेंगे  मूल्यों के पतन के कारण, आने वाले समय में वृद्ध लोगो के लिए घर, सेवा की जगह नहीं रह जायेगी और वृद्धाश्रम में शरण लेने के लिए उन्हें बाध्य होना पड़ेगा क्योंकि हम बच्चो की आवश्यकता पड़ेगी तो सेवाभाव की कमी के करण वे समयाभाव का रोना रोयेंगे और स्वयं सेवा न करके वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देंगे |

                    

आखिर समाज की इस पतनशील व्यवस्था के लिए दोषी कौन ? क्या बच्चे? बच्चो को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है | कोई भी बालक जन्म से न तो अपराधी होता है और न ही वह किसी विशेष धर्म के अनुयायी के रूप में जन्म लेता है | इस संसार में उसे प्रदान की गई शिक्षा और उसके साथ किये गए प्रतिक्रिया उग्र व्यव्हार ही उसे अपराध की दुनिया की ओर धकेल देते है | जिस बच्चे के साथ यह समाज प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है, तो यह मनोवैज्ञानिक रूप से पुर्णतः सत्य है की वह अपराधी नहीं बन सकता है | इसी प्रकार माता-पिता द्वारा अपनाये गए धर्म की शिक्षा दिये जाने के कारण ही बालक उनके ही धर्म को स्वीकार कर लेता है | यह बात भी मनोवैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुकी है | यदि किसी बालक को जन्म के कुछ महीने बाद किसी दुसरे धर्म के व्यक्ति के पास रख दिया जाये और 18 वर्ष बाद उसे उसके माता-पिता धर्म के बारे में बताया जाये तो वह स्वीकार नहीं करेगा |

              

जीवन में मूल्यों को धारण करने के लिए आत्मिक शांति एवं शक्ति की आवश्यकता होती है | परन्तु इस स्रष्टि रंगमंच पर लम्बे समय से कर, विशेषकर नकारात्मक कर्म करने से मनुष्य की आत्मिक शक्ति अत्यन्त कमजोर हो गई है | इस शक्ति के अभाव में ही क्रोध की प्रवृति उत्पन्न होती है | प्रेम और शांति आत्मा की शक्तियां है | इन शक्तियों से जीव में मूल्यों को धारण करने की क्षमता उत्पन्न होती है और मनुष्य सत्कर्म करता है | यदि हम वास्तव में एक वर्गविहीन लोकतान्त्रिक समाज की रचना करना चाहते है तो मूल्य और अध्यात्म की शिक्षा अपरिहार्य है | कानून और दण्ड की, समाज की व्यवस्था  को बनाये रखने और संचालित करने में भूमिका हो सकती है परन्तु मात्र कानून के द्वारा ही श्रेष्ठ नागरिको का निर्माण नहीं किया जा सकता |

          

ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर , लोगो में व्याप्त अज्ञानता और देहाभिमान को परिवर्तन करके कालचक्र के नकारात्मक प्रवाह को सकरात्मकदिशा में मोड़कर , सतयुगी दुनिया की संकल्पना को साकार करना सम्भव है | यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य है की यदि किसी स्थान की जनसँख्या के एक प्रतिशत लोग, किसी एक ही प्रकार के संकल्प में स्थिति होते है तो उससे उत्पन्न प्रकाम्पनो के शक्तिशाली प्रभाव से अन्य लोगो ले वोच्जर पर व्यव्हार में भी परिवर्तन आने लगता है | जब सत्कर्म करने वाले व्यक्ति एक ही स्थान पर , एक सतयुगी समाज की नवरचना का संकल्प करते है तो वायुमंडल में पवित्रता के प्रकाम्पनो का प्रवाह शक्तिशाली होने लगता है | मनुष्य और प्रकृति के तत्वों के गुण-धर्म बदलने लगते है |
मनुष्य का मन अत्यन्त संवेदनशील होता है और वह वातावरण से अत्यन्त सक्रिय रूप से प्रभावित होता है इसलिए यदि हम वास्तव में विद्यालयों के वातावरण को सकरात्मक  बनाकर योग्य और चरित्रवान नागरिको का निर्माण करना चाहते है तो इसका एकमात्र साधन है पाठ्यक्रम में मूल्य शिक्षा को लागु करना | यही समय की पुकार है और वर्तमान समाज की सर्व समस्याओं का समाधान भी है |   

Sunday, 22 October 2017

संकल्पवान और संकल्पहीन






किसी ने सत्य कहा है, “यह दुनिया संकल्पवानो की है, संकल्पहीन तो यूँ ही भूमि का भर बढाया करते है |” जैसे बलवान और बलहीन का अंतर स्पष्ट है किसी भी परिस्थिति में , प्रतिकूलता में भी जो धारण किये हुए श्रेष्ठ संकल्पों को द्रढ़ता से पकडे रहता है, उनको क्रियान्वित करता रहता है , वह है संकल्पवान और जो विपरीत परिस्थितियों के झोकों में या अल्बेलेपन में या लापरवाही में अपने श्रेष्ठ संकल्पों को त्याग देता है, भुला देता है या ढीले कर देता है वह है संकल्पहीन |
संकल्प की द्रढ़ता पर जीवन की उन्नति-अवनति निर्भर है | मजबूत संकल्प वाले की मंजिल की और गति द्रुत होती है और संकल्प में दिल आने से गति भी लंगडाती –लड़खड़ाती नजर आती है | गति में भय और संशय द्रश्यमान होता है, लगता है जैसे कोई जबरदस्ती घसीटे जा रहा है
                                  
                          

प्रश्न यह है की संकल्प टूट क्यों जाता है , उसे मजबूत बनाने का उपाए क्या है? इसका उत्तर बड़ा सरल है | जो अपने लक्ष्य पर मन को टिकाता नहीं , बार- बार लक्ष्य का स्मरण करता नहीं तो मन को अहसास होने लगता है की शायद यह लक्ष्य महत्वपूर्ण नहीं है और वह कही भी खिसक जाता है | दूसरी बात,मन के सामने दो विकल्प है, एक तो वह लक्ष्य की और जाए और दूसरा, इन्द्रियों के रासो में भटके | यदि इन्द्रियो की ओर भागता है तो शब्द,रस रूप स्पर्श के झूठे आकर्षणों में फंसकर लक्ष्य को भुला देता है | इन्द्रियो पर नियंत्रण करके ही लक्ष्योंमुख हुआ जा सकता है | तीसरी बात है, जो प्रतिकूलताओं को सहन नहीं कर पाटा वह भी लक्ष्य से विचलित हो जाता है |
                   
                    


संकल्पवान का अर्थ है दृढ इच्छाशक्ति वाला | द्रढ़ता और जिद्द में अंतर है | द्रढ़ता सफलता का अधर है और जिद्दी कभी सिद्धी और प्रसिद्धि नहीं पा सकता | जिद्द के पीछे व्यक्ति का पूर्वाग्रह , पुराना संस्कार,स्वार्थ मै-पन आदि हॉट अहै | वो संस्कार उसे उद्दीप्त करता है और वह परिणामो को नजरअंदाज करके भी अपनी बात,अपने विचार अपने द्रष्टिकोण को ऊपर रखता है | यदि कोई बाधक बनता है तो वह क्रोध करता है, शत्रुता ठान लेता है | इस प्रकार नकारात्मकता वशीभूत होता है | इतिहास में कई लोगो की जिद्द के कुपरिणाम दर्ज है | मुहम्मद तुगलक ने राजधानी बदलने की जिद्द की जिसके कुपरिणाम कइयो ने झेले | भारत-पाकिस्तान का विभाजन भी जिद्द का ही कुपरिणाम है | कोई शक्ति अर्जित करके जिद्दी हो जाये तो परिणाम अधिक भयंकर हो जाते है | जिद्दी की भेट में द्रढ़ता वाला अपने ह्रदय की पवित्र भावनाओ के सहारे आगे बढता है | किसी के प्रति भी कोई नकारात्मक भाव ना रख वह केवल लक्ष्य को सामने देख चलता जाता है | इस क्रम में कोई बाधक भी बनता है तो भी न तो उसे क्रोध आता, न वो हतोत्साहित होता, न रूकता बल्कि उसके प्रति रहम भाव रखकर उसे भी साथी और सहयोगी बना लेता है | अतः द्रढ़ता की शक्ति से विजय होती हिया और जिद्द वाला हार खा लेता है |
                
            
        
महात्मा गाँधी ने कहा है,”मुट्ठीभर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते है | भारत की आज़ादी की लड़ी के दौरान उन्होंने सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाया और नारा दिया, ‘करो या मरो’ | सारा भारत इसमें कूद पड़ा , इस भावना के साथ की या तो आज़ादी लेकर छोड़ेगे या मर मिटेंगे | जेले भर गई | जेलों में लोगो को डालने की जगह नहीं बची | जब उन्होंने दांडी यात्रा शुरू की तब भी कितनी द्रढ़ता थी ! शारीर की आयु बड़ी थी लेकिन चलने में सबसे आगे | इतने तेज चलते थे की पीछे चलने वाले दौड़ते थे | तब भी उनका नारा था , चाहे मई कुत्ते की मौत मरू , चाहे मई कौए की मौत मरू पर नमक कानून भंग करूँगा | गर्मी में चले, कांटो पर भी चले, पत्थरो पर भी चले, भूखे-प्यासे भी चले, अकेले भी चले पर द्रढ़ता के साथ चले | लोग पदों पर चढ़कर देखते थे | शारीर की कोई सजावट नहीं, भीड़ में घिर जाते थे | ताकत इसमें थी ? संकल्प में ताकत थी | उस ताकत ने भारत को आजाद करा दिया | अब हमारे सामने भी एक बहुत बड़ी मंजिल है, पहले हम खुद को तो आजाद करे |हमरी लड़ाई तो अपने आप से है |
एक बार एक किसान के गोदाम में बहुत सरे चूहे घुस गए और अनाज ख़राब करने लगे | किसान ने लोहे का एक बड़ा पिंजरा बनवाया , उसमे चूहे फंसने लगे | एक दिन एक बहुत मोटा चूहा फंस गया | उसे बड़ा बुरा लगा की की मै तो बंधन में आ गया | उसने उछल-कूद बहुत मचाई, इससे पिंजरा खिसकने लगा | उसको लगा की मै खिसकाते-खिसकाते इसे बाहर ले जा सकता हूँ और सचमुच वो गोदाम से बाहर जंगल में आ गया | उसे बड़ी ख़ुशी हुई की मै गोदाम के बंधन से छुट गया गोदाम से तो बाहर आ गया लेकिन पिंजरे में तो अभी भी था | हम सब भी कई गोदामों से तो बाहर आ गए है लेकिन पिंजरे में तो अभी भी है | वो पिंजरा कौन-सा है ? खुद के कमजोर संस्कारो का, स्वाभाव का , खुद की आदतों का | गोदाम का बंधन तो बहुत बड़ा था, दिखता था पर यह पिंजरे का बंधन सूक्ष्म है, दिखता नहीं | इस पिंजरे से बाहर आने के लिए चाहिए मुक्ति के प्रति दृढ संकल्प शक्ति | इसके लिए पहले अपनी चेकिंग करनी है और फिर अपने को बदलना है |
                          
                           
शिव बाबा ने कहा है, अपने को बदलने के लिए चाहिए अपने मन के ऊपर राज्य | अमन फिसलने लगे तो हम इसे रोके | हम बार-बार देखे की मन कहाँ गया ? मैंने संकल्प क्या किया था , फिर ढीला कैसे हो गया ? जैसे गाड़ी चलानी सिखने वाला ध्यान रखता है की क्या मई इसे सड़क पर चला रहूँ ? यह सड़क से नीचे कैसे उतर गई, उसे फिर सड़क पर लायेगा | गाड़ी फिर नीचे घास में रेट में जाएगी,फिर सड़क पर लायेगा और ऐसे करते-करते वह कुशल हो जायेगा | मन भी ऐसे है हम इसे मंजिल की ओर ले जाते है, यह फिर फिसल जाता है | अतः हमारा अधिकतम ध्यान इस बात पर चाहिए की मन क्या कर रहा है ? कहाँ गया ? क्यों गया ?  मेरा निर्णय ठीक है ?मै संस्कारो के वशीभूत तो नहीं हूँ? मेरे संस्कारो को कुसंग तो नहीं लगा ? मेरे मूल संस्कार कौन-से है ? क्या मेरे मूल संस्कार कर्म में आये या कोई मिलावट हुई ?
इन्द्रियो की आदत है, ये एक विषय से दुसरे विषय पर एक पल में खिसक जाती है और इनको उकसाता है मन | अगर मन वश में है तो आंख ताकत नहीं की वो किसी विषय पर अटके | मन पीछे बैठकर कहता है की इसे देखते ही रहना, पीछे हटना नहीं, तो आंख को मन का सहयोग मिल जाता है | आत्मा यदि कहती है की यहाँ से हटो,यह गलत है तो भी आंख मानती नहीं क्योंकि मन आकर्षित है | तो आत्मा पहले मन को हटाये, मन को विश्वास में ले | शिव बाबा कहते है , संकल्प को मोड़ो , संकल्प को बचाओ, संकल्प व्यर्थ गया तो साड़ी शक्ति व्यर्थ चली जाएगी | जब भी एकांत में बैठो, अपने तीनो अनादि साथियो (मन,बुद्धि,संस्कार) को पुचकारो, उनको प्यार हाल-चाल पूछो , उनकी दिशा की जाँच करो |
                     

Ad