Saturday, 30 September 2017

भूतकाल में मत भटकिए



  हमें भूतकाल के बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए,जो बीत गया सो बीत गया पिछले को कभी नहीं याद करना चाहिए | हमें वर्तमान को अच्छी तरह से सुधारना चाहिए, भविष्य अपने आप सुधर जायेगा क्योंकि वर्तमान सही है तो भविष्य सही ही रहेगा, आने वाले के बारे में नहीं सोचना चाहिए और जो बीत गया उसके बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए | इसी तथ्य को स्पस्ट करते हुए आइये जानते है कि भूतकाल में क्यों नहीं भटकना चाहिए |
                               
 

जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह बहुत अच्छा होगा | 
                     ओम शांति

                भूतकाल में मत भटकिए 

म में से कई आमतौर पर सुबह गुनगुना पानी पीते है | यदि थर्मस में पहले का ठंडा पानी पड़ा हो तो उसे फेककर नया पानी भरते है | यदि पुराने पानी पर नया पानी डाल दे तो नए कि गुनगुनाहट समाप्त होने कि सम्भावना रहती है |  विचार भी ऐसे ही है | यदि नए विचारो को मन में भरने से पहले पुराने विचारो से मन को खली ना करे तो नए विचारो के तरोताजापन में कमी आ जाती है | नए कि नवीनता और चमक तभी स्पष्ट दिख सकती है जब उसको पुराने के प्रभाव से बचाया जाए | यदि हम पुराने पानी को फेकना नहीं चाहते तो ऐसा कर सकते है कि उसे अलग से तोड़ा गर्म करके फिर इस नए में मिला ले तो नए जल कि गुनगुनाहट में अंतर नहीं आएगा | इसी प्रकार यदि पुराने विचारो को फेकना नहीं चाहते तो उन्हें भी नवीनता के रंग में रंग ले | फिर वे नए विचारो के साथ मेल- मिलाप कर लेंगे | यदि पुराने विचार भौतिक थे , सांसारिक थे विकारो में रेंज थे, तो उन्हें और उनसे जुडी घटनाओ, व्यक्तियो को आध्यात्मिक स्वरुप देकर उस नए रूप में देखना, जानना, व्यवहार करना शुरू कर दीजिये | इससे नए- पुराने का सामंजस्य स्थापित हो जायेगा | पीछे खीचने वाला भूतकाल ऊपर चढ़ने कि सीढ़ी बन जायेगा |
          
         आगे बढ़ने के लिए पिछला छोड़ना अनिवार्य है 

प्राप्त का जितना त्याग करेंगे, उतना आगे बढ़ेंगे | जैसे एक तैरक पानीको पीछे धकेलता जाता है और आगे बढ़ता है | हमें जो प्राप्त हो रहा है उस में खो ना जाये बल्कि उसे देकर, बांटकर आआगे बढ़ते जाये | जो प्राप्त है उसे पकड़कर बैठ गए तो वही जाम हो जायेंगे आगे नहीं बढ़ पाएंगे | 

यदि हमें छत पर जाना है और पहली सीढ़ी पर पैर रख लिया है तो यह जरुरी है कि उस पहली सीढ़ी का त्याग कर दे , तभी तो अगली तक पहुचेंगे | एक के बाद एक का त्याग करना ही होगा, तभी तो अगली तक पहुंचेंगे | एक के बाद एक का त्याग करना ही होगा , तभी छत पर पहुच पाएंगे अन्यथा वही यानि पहली सीढ़ी पर ही कहदे रहेंगे | ईश्वर कि ओर कदम बढ़ने में पुराने देह, देह के सम्बन्धो कि सीढिया तो छोडनी ही पड़ेगी | उन्हें पकड़े-पकड़े परमात्मा पिता को कैसे पकड़ पाएंगे | केवल सीढ़ी पर चढ़ने का ही नहीं, जमीन पर चलने का सामान्य नियम भी यही है | हम पिछला कदम उठाते है , उसके नीचे कि जमीन को छोड़ते है तब आगे बढ़ते है अतीत की अनावश्यक स्मृतियां ही वह जमीन है जिससे बुद्धि रुपी पाँव को हटाना जरुरी है |
                        
           लिखे हुए पर पुनः लिखना असम्भव

यदि हमारे पास अख़बार का या किसी किताब का ऐसा पन्ना है जिस के दोनों ओर गहरे-गहरे अक्षर लिखे हुए है तो उस भरे हुए कागज पर कुछ भी नया लिखना असम्भव होगा | पुरानी स्मृतियों से, पुराने संस्कारो से भरी आत्मा पर भी कुछ नया लिखना लगभग असम्भव  होता है इसलिए पुराने, अनावश्यक, नकारात्मक, अज्ञान से भरे कर्मो कि स्मृति को मिटाना परम आवश्यक है |
                         
            सार ग्रहण करे और आगे बढे 

जब हम कोई फल खाते या चूसते ई तो उसका गुदा (सार) हमारे पेट में चला जाता है और गुठली को फेक कर हम आगे बढ़ जाते है | क्या कुछ दूर जाकर हम उस फेकी हुई झूठी गुठली को उठाने आते है? नहीं जना | उसे तो सारहीन, व्यर्थ समझकर हम फेक चुके , फिर उससे मोह क्यों? भूतकाल भी ऐसा ही है | भूतकाल में जो हुआ उससे सीख ग्रहण करके, उससे सार ग्रहण करके ही तो हम यहाँ तक आये है, फिर पीछे मुड़-मुड़कर क्यों देख रहे है |
              
   चीजो कि तरह बाते भी हो जाती है प्रचलन से परे 

बहुत साडी बासी चीजे, पुरानी बाते हम बहुत जल्दी बदल लेते है या फेक देते है और ज़माने के साथ कदम से कदम मिलकर चलने का प्रयास करते है | एक जमाना था जब लोग रात का बना  बासी खाना खा लेते थे पर अब जान गए है कि ऐसे खाने से बीमारियाँ हो जाती है इसलिए उसे फेक देते है | पहले पीतल-कासी के बर्तनों में खाना खाया जाता था पर अब ये पुराने फैशन के बर्तन घरो से निकल चुके है और नए ज़माने के स्टील, कांच या प्लास्टिक के बने बर्तन घरो कि शोभा बड़ा रहे है माताएं- बहने जिन भरी-भरी घाघरो को पहनती थी अब वे भी कही नजर नहीं आते |उनका स्थान नए ज़माने के सलवार, कमीज \, पेंट, साड़ी ने ले लिया है | को आउट ऑफ़ फैशन मानकर उनसे पीछा छुड़ा लिया  है परन्तु सवाल यह है कि बातो का फैशन भी तो बदलता होगा, वे भी तो पुरानी होती होंगी | फिर हम उन पुरानी बातो और पुरानी स्मृतियों को क्यों छाती से चिपकाए बैठे है ? उन्हें भी पुराने ज़माने कि समझकर फेकिये और उनके स्थान पर नै स्मृतियो  को भर लीजिये |
जब हम छोटे थे, हमारे पहनने के कपडे छोटे-छोटे थे | हम बड़े हुए तो वे अपने आप छुट गए | अब कोई दिखाए तो भी मुस्कुराकर उनसे मुहं फेर लेते है | जैसे शरीर के बड़े होने पर बालपन के कपड़े छूट गए इसी प्रकार मन के अनुभवी, ज्ञानी, समझदार होने पर बालपन कि बाते, वे अनुभवहीन स्मृतियां, वे देहभानवश कि गई भूले भी तो पीछे छूट जानी चाहिए  और उनके स्थान पर आज कि मन स्थिति के अनुकूल ज्ञानयुक्त बाते स्मृति में रहनी चाहिए | उम्र के आगे बढ़ने के साथ-साथ ज्ञान और समझ भी तो विकसित होने चाहिए |
                       
             स्व परिवर्तन ही सही पश्चाताप है
  
कई बार भूतकाल कि कोई गलती हमें बार – बार कचोटती है | हमारा मन बार बार उस कि गई गलती वाले स्थान पर जा खड़ा होता है और गलती का पुनः स्मरण कर दुःख और पश्चाताप में डूबता है | परन्तु ऐसा करने से गलती ठीक में बदल जाती है क्या? माल लो हमारा पांव कीचड़ में डाल गया, कीचड़ में सन गया तो क्या हम पुनः कीचड़ के पास जाकर पांव को उसमे डालकर अफ़सोस करते  रहे कि हाय,पांव को कीचड़ लग गया या फिर जुटे और पांव से कीचड़ को पोछकर पहली स्थिति में आ जाये और सुकून महसूस करे |यदि कीचड़ सने पांव को स्मरण करेंगे तो दर्द झेलेंगे और पोछे हुए साफ़-सुथरे पांव को बार-बार देखेंगे तो आत्मविश्वास से भरेंगे | सही पश्चाताप है स्व का परिवर्तन कर लेना
                      
            मिटाए जा सकते है पुराने निशान 

कई लोग सवाल उठाते है कि गलती जब थी तब हम अनजान थे, समझ कि कमी थी, बाल बुद्धि थी, कर्मो कि गहन गति का ज्ञान नहीं था, आज जब समझ आई है तो वह कर्म गलत था,यह अहसास बार-बार हो रहा है, पर क्या उसे मिटाया जा सकता है ?क्या पड़े हुए निशान, लगाई गई  लकीरे मिटाए जा सकते है ? अध्यात्म कहता है, हाँ, ऐसा हो सकता है | परमात्मा कि यथार्त,एकरस, गहन स्मृति उन लकीरों और निशानों को मिटा सकती है | यदि साइंसके बल से किसी चीज,स्थान यहाँ तक कि व्यक्ति के रूप को भी बदला जा सकता है तो साइलेंस बल से भी पूर्व में किये गए कर्मो का रूपांतरण हो सकता है | उन कर्मो कि स्मृति के स्टाक को खली किया जा सकता है और उनके स्थान पर श्रेष्ठ कर्मो कि स्मृति को भरा जा सकता है| जैसे हाथो पर लगी गंदगी धोने से हाथो का कोई नुकसान नहीं होता इसी पप्रकार मन-बुद्धि में भरी पाप कर्मो कि स्मृति को विस्मृत करने और उसके स्थान पर श्रेष्ठ कर्मो कि स्मृति भरने से भी कोई नुकसान नहीं होता | भूतकाल मृत है और भविष्य अजन्मा है | जीवित तो केवल वर्तमान है | इसलिए किसी ने ठीक ही कहा है, गुजरे हुए का जिक्र न कर , आने वाले का फ़िक्र न कर,प्राप्त हुए का फख्र कर |

Wednesday, 27 September 2017

सयंमित वाणी



कानो कि सफाई का मतलब है कि बुरा सुनते हुए भी अच्छा सोचना जो लोग अच्छा सोचते है वो लोग कभी भी दुखी नहीं हो सकते क्योंकि, जो हम सोचते है चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक सोचना हमें ही पड़ता है इसलिए हमें सदा सकारात्मक ही सोचना है तभी दुखो का अंत हो सकता है                               
        

                                       कानो की सफाई

हम जीने के लिए दिनभर कई शारीरक क्रियाएँ जैसे- साँस लेना, पानी पीना, भोजन करना आदि करते है परन्तु कई बार इन क्रियाओ के साथ कुछ अवांछित कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते है | वे भयंकर रोग का कारण बन जाते है जिन्हें ख़त्म करने के लिए फिर कडवी दवाइयों का सेवन करना पड़ता है कीटाणुओ से बचने के लिए हम आवश्यक सावधानी रखते है जैसे कि पानी को फ़िल्टर कर पीना, भोजन बनाते समय सफाई का ख्याल रखना,बदबू वाली जगह पर मुहं ढक कर रखना आदि | कीटाणुओ से शरीर कि रक्षा के साथ-साथ बुराइयों से मन कि रक्षा भी आवश्यक है यह सम्भाल न रखने से कई भयंकरमानसिक बीमारियाँ (बुराइयाँ) जैसे कि इर्ष्या नफरत, सम्बन्धो में मतभेद, मनमुटाव , दूरियां , चिडचिडापन , क्रोध आदि विकराल रूप धारण कर हमें खोखला करने में कोई कसार नहीं छोडती | अन्दर गलत विचार जाने का एक रास्ता है हमारे कान | दिन भर इन कानो से कुछ न कुछ सुनते रहते है | हम इनसे सत्संग भी सुनते है पर कई बार इनसे कुछ गलत बाते भी अन्दर चली जाती है जो हमारे विचार प्रक्रिया, बोल तथा आचरण पर गहरा असर डालती है |
                           
                       ट्रिप्ल फ़िल्टर  

महान दार्शनिक सुकरात के अनुसार कोई भी बात सुनने से पहले सुननाने वाले से यह सुनिश्चित कर लेना चहिये कि 1. वह बात सत्य हो 2. अच्छी हो और 3. उसमे हमारे लिए कुछ उपयोगिता हो | यूँ ही व्यर्थ सुनने का कोई औचित्य नहीं | जैसे हम ट्रिप्ल फिल्टर्स पानी का प्रयोग करते है , ऐसे ही कानो पर यह ट्रिप्ल फिल्टर लगाकर ही हमें बातो को अन्दर प्रवेश होने देना चाहिए ताकि नकारात्मक बाते नुकसान न पहुंचाए |
                  
              सुनी हुई बात का असर जरुर होता है

आत्मा मन , बुद्धि, संस्कार सहित है हम जो भी सुनते है उसे आत्मा मन द्वारा ग्रहण करती है , वह बुद्धि पर चित्रित होकर संस्कारो में अंकित हो जाता है और किसी व्यक्ति के प्रति एक अनजानअवधारण का निर्माण करता है ज्ञान के गीत, संगीत सुनकर मनुष्य प्रसन्नता, हल्केपन का अनुभव करता है वही व्यथा के गीत सुनने से गंभीर हो जाता है , भजन सुनने से प्रभु-प्रेम में मग्न हो जाता है लड़ाई-झगड़ा शोर, गलियां आदि सुनने से दुखी अशांत होकर चिडचिडापन अनुभव करता है | अपनी प्रशंसा सुनने से कार्य प्रति उत्साह- उमंग बढ़ता है | और निदा सुनकर निराशा , नाउमीदी तथा सफलता का अनुभव करता है
                          
               उचित व्यक्ति को सुनाएँ

गंदगी से बचाने लिए जैसे चीजो को ढककर रखते है ऐसे ही कानो को भी ज्ञान का ढक्कन लगाकर रखना चाहिए फिर भी यदि जाने- अनजाने, चाहे-अनचाहे कोई ऐसी बाते सुनने कोई इल जाती है जो नहीं सुननी चाहिए तो उन्हें निकालनाभी आना चाहिए | जैसे जगह जगह कचरा बिखेरने से गंदगी, बीमारियाँ बढ़ती है,कचरे को उचित स्थान पर ही डाला जाता है ऐसे ही किसी कि कमी कमजोरी को जगह जगह वर्णन करने से वातावरण भरी तथा दूषित होता है और वह व्यक्ति भी स्वयं को बदलने में असमर्थ महसूस करता है इसलिए बात वहां बताये जहाँ से उसका सुधर हो सके | शुभकामना रखकर बताये, गलत भावना रखकर नहीं |
                   
              कमल समान बनाये कानो को

प्यारी मातेश्वरी जी कहा करती थी कि ये कान कचरे के डिब्बे नहीं है जो इधर-इधर कि फ़ालतू,गन्दी बाते सुनकर इन्हें गन्दा करते रहो और स्वयं को बीमार करते रहो | कानो कि सफाई पर ध्यान बहुत जरुरी है देवताओ के शरीर के हर अंग का वर्णन करते समय कमल शब्द जोड़ा जाता हो, जैसे कमलमुख,कमलनयन,कमलकर्ण आदि | तो हम भी कानो को कमल सामान बनाये अर्थात सुनते हुए भी न्यारे-प्यारे बनकर रहे | दुनिया के बीच में रहकर ही अपने कानो को कमल सामान बनना है, दुनिया को त्यागकर नहीं |
                           
                           लोभ से पनपता है पाप

नुष्य अपनी परेशानियों का कारण स्वयं ही है क्योंकि वह सदमार्ग को छोड़कर धन के पीछे भाग रहा है धन का लोभ अनेक मुसीबते को जन्म देता है | लालच आने पर स्वार्थ कि भावना जागना स्वाभाविक है | लालची ब्यक्ति कई तरह के पाप कर्मो में फंसकर गलत निर्णय ले लेता है लालच संसार में ज्ञानी,तपस्वी,शूरवीर,कवी,विद्वान और गुणवान आदि भी उपहास के पात्र बने है इसलिए मन को सदा नियंत्रण में रखना जरुरी है |
                          
                     लालच बढता है मोह से

लालच तुरंत लाभ तो दे सकता है किन्तु अंततः उसका परिणाम बुरा ही होता है | दुसरे का बुरा सोचने वाला स्वयं भी अपनी गलत सोच का शिकार होता है चल का परिणाम चल के हो रूप में आता है | कहते है-लालच बढता है मोह से और यही संग्रह-वृत्ति को भी प्रोत्साहन देता है | इसलिए निजी स्वार्थ छोड़कर हर एक के प्रति शुभ भावना , शुभ कामना व कल्याण कि भावना रखने में ही स्वयं का भला समाया है |लोभ से पनपता है पाप इसलिए कहावत है, पाप का बाप है लोभ | लोभ कि नीव में सदा दुसरो के लिए अकल्याण ही होता है इसलिए यह एपीआई समग्रता यह अपनी समग्रता में अकल्याणकारी परिणाम ही देता है | इस पर एक कहानी इस प्रकार है –
एक जमीदार था | उसने एक किसान को अपने खेतो में काम करने के लिए रखा हुआ था और बदले में जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा दे रखा था | किसान ने उस जमींन के टुकड़े में एक बगीचा बना रखा था जिसमे अंगूर कि बेल लगे हुई थी | उसमे हर साल बड़े मीठे-मीठे अंगूर फलते थे | किसान अत्यंत परिश्रमी,सत्यवादी और त्यागी था | एक दिन उसने विचार किया कि बगीचा तो में श्रम कि दें है किन्तु भूमि तो जमीदार कि ही है | अतः इन मीठे अंगूरों में से उन्हें भी कुछ भाग मिलना चाहिए अन्यथा यह में उनके प्रति अन्याय होगा और मै ईश्वर के सामने मच दिखने योग्य नहीं रहूँगा
यह सोचकर किसान ने जमीदार के घर कुछ मीठे अंगूर भिजवा दिए | उधर जमीदार ने सोचा , अंगूर कि बेल मेरी जमींन पर है इसलिए उस पर मेरा पूर्ण अधिकार है | मै उसे अपने बगीचे में लगा सकता हूँ | लोभ के अंधकार में जमीदार को सत्क्र्तव्य का भी दयां नहीं रहा | उसने अपने नौकरों को आदेश दिया कि बेल उखाड़ कर मेरे बगीचे में लगा दो | नौकरों ने मालिक कि आज्ञा का पालन किया | बेचारा किसान असहाय था वह सिवाय पछताने के क्या कर सकता था नौकरों ने आगया का पालन किया किन्तु फल देने कि बात तो दूर रही बेल कुछ ही दिनों में सूख | लोभ के कीड़े ने अंगूर कि बेल को सदा के लिए मिटा दिया |
                                 
लालच ऐसी कैंची है जो कभी भी , कही भी नुकसान करने में पीछे नहीं रहती | इसमें खुद का कोई गेदा ना हो रहा हो लेकिन दुसरो को नुकसान में डालना लोभी का मासाद बना रहता है | आज के युग में धन के बिना कुछ नहीं-ऐसा लोग सोचते है | सुनने में चगे अच्छा न लगे  लेकिन सच तो यही है कि हर पाप इसी से पैदा होता है | जब व्यक्ति के मन में लोभ जगता है तो उसके साथ क्रोध भी साइन पर आकर बैठ जाता है और अहंकार माथे पर चढ़कर बोलता है और यही से जीवन कि चल बिगड़ने लगती है | जिस धन के लिए मानव इतना पागल हो रहा हिया वह किसी का नहीं है | जिन्हें अपने आप पर विश्वास है वे आसानी से लालच से बाख सकते है | लोभी व्यक्ति स्वयं पर विश्वास को छोड़ दुसरो में सुख ढूंढता है |


                     संयमित वाणी
बीरदास ने वर्षो पहले कहा था , “वाणी ऐसी बोलिए,मन का आपा खोय,औरन को शीतल करे,आपहू शीतल होय |” भावार्थ यह है कि बोल-चालया वाणी ऐसी होनी चाहिए जो मन का मै-पण खत्म हो जाये तथा दुसरो के साथ-साथ खुद भी शीतलता महसूस करे | यह भी कहा जाता है कि ‘तोल-तोल के बोल’ | हर बात सोचने कि हो सकती है पर हर बात कहने कि नहीं होती अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से रखने के लिए शब्दों को सावधानी से चुने | जीभ हमारी अपनी है ,, इसका इस्तेमाल हम अच्छा बोलने में करे या बुरा बोलने में, यह चुनाव भी हमारा है | किसी को आप मिसठानभले ही न किला सके लेकिन आपके मीठे बोल भोजन को को मीठा बना देंगे | इस विषय में एक छोटी-सी रोचक कहानी याद आती है एक किसान ने अपने पडोसी कि खूब आलोचना कि | बाद में उसे लगा कि उसने कुछ ज्यादा ही का दिया | उसको पश्चाताप होने लगा | वह पादरी के पास गया और बोला,मैंने अपने पडोसी को बहुत खरी-खोटी सुना दी , अब उन बातो को कैसे वापस लूँ? पादरी ने उसे पक्षियों के कुछ पंख दिए और कहा कि इन्हें शहर के चौराहे पर डालकर आ जाओ जब किसान वापस आया तो पादरी ने कहा, ‘अब जाओ और उन पंखो को इक्कठे करके वापिस ले औ |’ किसान गया लेकिन चौराहे पर एक भी पंख नहीं मिला, सब हवा में उड़ गए | किसान कहली हाथ लौट आया | पादरी ने कहा जीवन का शाश्वत सत्य यही है कि जैसे हवा में उड़े पंखो को इक्कठे करना मुश्किल है, वैसे ही कहे हुए शब्दों को वापिस लेना नामुमकिन है अतः हमेशा सोच- समझकर बात मुहं से निकालनी चाहिए |’
                           
                    कैसे करे वाणी संयम

हमारी वाणी हमें ऊपर भी उठा सकती है और निचे भी गिरा सकती है | यश-अपयश दोनों ही हमारी बोल-चल से हमें मिलते है | आचे विचार मन में लायें, हमारी भाषा में भी उनका असर दिखेगा | परमात्मा कि याद में रहकर महत्वपूर्ण निर्णय करे | इससे मन में धीरज रहेगा तथा वाणी से मधुर वचन निकालेंगे | कोई भी बात कहने से पहले खूब विचार- मंथन करके बोलने से गलत या व्यर्थ वाक्य मुहं से नहीं निकलते | यही जीवन में सुख,शांति भरने कि कला है | यदि कभी कटु सत्य कहना आवशयक भी हो तो भी शब्दों का उचित चयन करे |
                   
                   वाणी संयम के लाभ

कहते है, श्रेष्ठ विचारो से सम्पन्न व्यक्ति कि जीभ पर माँ सरस्वती का निवास होता है | बोलने से ही हमारे व्यक्तित्व कि परख होती है | कम व जरुरत अनुसार बोलने वाले को ज्ञानी कहा जाता है, अधिक तथा फिजूल बोलने वाले को मुर्ख कहा जाता है |इसी से हम जग –विख्यात अथवा कुख्यात बन जाते है | हमारी भाषा सम्बन्धो को निभाने हेतु बेहद महत्वपूर्ण होती है | बोल-चाल में आत्मीयता व सहजता होती है तो रिश्तो में भी और ताल मेल बना रहता है | किसी के बारे में इधर उधर कहने कि बजाये उसी व्यक्ति से स्पष्ट रूप से बात करना अच्छा होता है | तानो, उल्हानो और नसीहतों से रिश्तो में तनाव पैदा हो जाता है | मधुर  एवं सधे हुए वचन बोलने से गिरो को भी अपना बना सकते है | बड़ी से बड़ी भूल होने पर भी प्यार भरे शब्दों में माफ़ी मांगने से सामने वाला क्षमा कर देता है |

Tuesday, 19 September 2017

सर्वोत्तम सेवा -- मनसा सेवा







                                 
वर्तमान समय कि परिस्थितियो और वातावरण को देखते हुए सबसे सहज, सगल , कमखर्च बालानशीन सेवा है मनसा सेवा | इसका अर्थ है, सकारात्मक, श्रेष्ठ,पवित्र ,शक्तिशाली विचारो से प्रक्रति , व्यक्ति और वातावरण को पवित्र और शक्तिशाली बनाना | इस प्रकार कि सर्वोच्च सेवा कौन कर सकता है ? जो मै और मेरे- पन के नकारात्मक भाव से सदा मुक्त है इस सम्बन्ध में एक कहानी याद आती है –
                               



किसी पुराने मकान में चूहे हो गए थे | एक दिन एक बिल्ली ने दो चूहों को पकड़ कर अपना भोजन बना लिया | धीरे-धीरे चूहों कि संख्या कम होने लगी | सभी सभी चूहे चिंता में पड़ गए कि हमें कौन बचाएगा | आखिर उन्होंने मिलकर पंचायत कि कि कैसे बिल्ली को यहाँ से बगाया जाये | एक नौजवान चूहा कहने लगा , देखो भाइयो , सभी मिलकर बिल्ली का मुकाबला करो | मै सबसे आगे चलूँगा बिल्ली का एक कान पकड़ कर फिर नहीं छोडूगा | दूसरे ने कहा, मै दूसरा कान पकड़ लूँगा | तीसरे ने कहा , मै टांग पकड़ लूँगा | इस प्रकार से कई चूहों ने बिल्ली के भिन्न-भिन्न अंगो को पकड़ने कि बात सुनाई | तभी एक बुढा चूहा जो बहुत बुद्धिमान और विचारवान था, कहने लगा , अब तक आप में से किसी ने भी यह नहीं बताया कि म्याऊ का मुख कौन पकड़ेगा? जब तक म्याऊ (मै) का मुख काबू नहीं होगा तब तक सबकी वीरता बेकार है | बूढ़े चूहे कि बात पूरी होते-होते बिल्ली आ गई | उसे देखते ही सभी जान बचने लिए इधर –उधर भागने लगे, फिर भी बिल्ली ने एक- दो को पकड़ ही लिया |
यही दशा आज मानव मात्र कि है | आज मानव मात पर कोई जाप कर रहा है, कोई कोई हवन, कोई जागरण,कोई व्रत कर रहे है, पर यह विचार किसी को नहीं आता कि म्याऊ (मै) को कैसे काबू में करे ? जब तक “मै” से मुक्त नहीं होंगे तो विकर्माजीत, प्रक्रतिजीत, कर्मेंद्रिजीत कैसे बनेंगे? किसी ने ठीक ही कहा है                                   

                     माला जपूँ न कर जपूँ,मुख ते कहूँ न राम 

मन मेरा सुमिरणकरे, कर पावे विश्राम


       वाणी के साथ मन का मौन करे         

  

प्रश्न उठता है कि मन में क्या सुमिरण करे ? पहले स्वयं प्रति शुभ भावना रखे अर्थात विचार करे कि मुझे जो शरीर, सम्बन्धी, वस्त,स्थान आदि मिले है उनसे हर हाल में संतुष्ट रहना है , खुश रहना है | जो स्वयं से सम्पूर्ण संतुष्ट है वही संसार कि सभी आत्माओ प्रति तथा प्रकृति के प्रति शक्तिशाली संकल्पों से श्रेष्ट तरंगे (वायब्रेशन) दे सकता है | मनसा सेवा तभी कर सकते है जब संसार कि किसी भी आत्मा के प्रति मन में कोई कड़वाहट, दाग अर्थात नकारात्मक भाव न हो किसी ने कैसा भी बोल बोला,व्यवहार किया फिर भी उसको निर्दोष मानकर यह मन ले कि उसका रोल निश्चित है एवं मुझ आत्मा द्वारा पिछले किसी जन्म में जाने-अनजाने किये गए किसी कर्म का ही परिणाम है | इसी प्रकार प्रकृति को सतोप्रधान बनने कि सेवा तभी कर सकते है जब उसके  तत्वों के प्रति भी कोई नकारात्मक न हो चाहे आज तत्व तमोप्रधान हो गये है , दुःख भी देते है पर इनके बिना हम जीवन जी नहीं सकते | तो प्रकृति के तत्वों को भी शुभ संकल्पों कि तरंगे दे | जितना हम तत्वों को सतोप्रधन बनने कि सेवा करेंगे उतना प्रकृति हमारी सहयोगी बनेगी, हमें सुख देगी | तो हमें स्वयं प्रति , सभी आत्मिक भाइयो प्रति, प्रकृति प्रति सदा शुभ सोचने कि मनसा सेवा अवस्य करनी है मनसा सेवा के लिए धन, समय शक्ति कि भी आवश्यकता नहीं है और सुपरिणाम निचित है | मनसा सेवा के लिए कुछ मानसिक तैयारी करे, वाणी के मौन के साथ मन का मौन करे \ मौन से मन कि शांति के द्वार तो खुलते ही है साथ ही उर्जा का संचय भी हो जाता है मन का मौन बेहतर सोच, गहन सोच का सुअवसर प्रदान करता है |
                              


महावीर,बुद्ध,जीसस और सुकरात ने मानवता के कल्याण के लिए अनेको बार अमृत वचन उच्चारित किये परन्तु जितना वो बोले उससे अधिक मौन में रहे | मौन क्षणों में उन्होंने गहरी अनुभूति कि | हमारी दादी जानकी जाग्रत अवस्था में भी मन का मौन रखने के कारण ही विश्व कि स्थिरतम मन वाली महिला बन पाई | मौन अपने आप में मंगलकारी स्थिति है | इस प्रकार मन, वचन के मौन से सदा मनसा सेवा में लगे रहे | याद रखे , जीवन का कोई भाग व्यर्थ नहीं, जीवन का कोई श्वास ब्यर्थ नहीं |
सबके प्रति हो शुभ संकल्प

तो जीवन बड़ा प्यारा लगता है


प्रक्रति के सभी तत्वों से हो प्यार


तो पूरा विश्व मधुबन लगता है


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