Thursday, 31 August 2017

Saturday, 26 August 2017

कर्ज और मर्ज कि दवा परमात्मा शिव



           कर्ज और मर्ज
स संसार में हर व्यक्ति अपने फर्ज कर्तव्य से बंधा है | फर्ज पूरा करके हरेक ख़ुशी महसूस करता है जैसे पिता का फर्ज है फ़रह है तो बच्चो कि पालना करना इसके लिए वह धन और साधन खुशी- खुशी
अर्जित करता है ऐसे ही एक माता का फर्ज है कि वह बच्चो को खिलाये पिलाये ओढ़ाय- पहनाये संभाले – वह भी इस कार्य को करते हुई इस प्रकार हम देखते है कि कि फर्ज कोई लादी हुई चीज नहीं बल्कि ख़ुशी से स्वीकार कि गई , स्वाभाविक जिम्मेवारी है | मर्ज का अर्थ है रोग | रोग तो मानव का सुकून छीन लेता है भी खर्च होता है, मन चिंतित रहता है और तन भी कमजोर हो जाता है फिर ऐसे चिंतित बोझिल व्यक्ति का सामाजिक पारिवारिक मान सम्मान भी काम हो जाता है |

              मोह बनाता है फर्ज को मर्ज 

वर्तमान समय हम देखते है कि कई लोगो का फर्ज मर्ज में बदल जाता है | वे फर्ज अदा करते ऐसे महसूस करते है मानो कोई मर्ज लगा बैठे है जिसे जबरदस्ती भोगना पड़ रहा है गहरे से विचार करने पर हमारे सामने यही निष्कर्ष आता है कि हम फर्ज अदा करते करते हदों में आ जाते है और मोहग्रस्त हो जाते है यदि बेहद कि द्रष्टि अपन्नाकर और डीतैच होकर कर्तव्य करे तो फर्ज मर्ज न बनकर अर्श (ऊंचाईयों) पर ले जाने का साधन बन सकता है
                   आये अकेले ,जाना भी अकेले 

संसार को सागर कहा गया है इसमें कई कुटुंब रुपी नौकाए परिवारजनों के लिए इस पार से उस पार जाने में लगी है | नौकनिवासी एक दुसरे से मोहग्रस्त हकर अर्थात तुम मेरी स्त्री हो , मै तुम्हारा पारी हूँ, तुम मेरे पुत्र हो मै तुम्हारा पिता हूँ” आदि कहते हुए मानते हुए खाने पिने अथवा भोग विलास में समाये खोते चले जाते है उन्हें परमार्थ श्रेष्ट कर्म परोपकार आदि के बारे में विचार करने का अवकाश ही नहीं मिलता | सागर में हिचकोले आते है लहरे आती तूफान भी आते नौका उलटती , पलटती भी है | ऐसे में वे एक दुसरे के मोह में बंधे होने के कारण कष्ट झेलते है और डूब जाते है यदि पहले से यह पाठ पक्का किया हुआ हो कि हम आये अकेले जाना अकेले तो तूफान का सामना करके सहजता से पार हो सकते है मोह और आसक्ति का त्याग करके परमात्मा पिता कि स्मृति में जीवन नैया को खेते चले तो पारिवारिक तूफान भी तोहफे में बदल जाते है

                     
                         सम्बन्धो कि गांठ को ढीला –ढीला बांधिए 

यदि हमें कही कोई ऐसी गांठ बंधनी हो जिसे थोड़े समाये बाद खोलना हो तो हम उसे ढीला ढीला बंधते है यदि कसकर बाँध दी तो सहजता से नहीं खुलेगी बहुत मेहनत से खुलेगी और हो सकता है ना ही खुले तब तो फिर उसे धागे या रस्सी या कपडे को जहा गांठ लगी है काट कर ही अलग करना पड़ता हिया इसी प्रकार परिवारजनों के साथ पदार्थो के साथ साधनों और सम्बंधित के साथ मोह ममता कि गांठ ढीली ढीली बांधिए क्योंकि इसे आज नहीं तो कल खोलना ही पड़ेगा | शरीर को छोड़ना ही पड़ेगा | शरीर छुटेगा तो सम्बन्ध और पदार्थ भी छुटेंगे यदि इन सबके साथ मोह और आसक्ति कि बंट कसकर बाँधी होगी तो जीते जी मर्ज झेलेंगे और अंत समय आत्मा अलग होने में कष्ट महसूस करेगी फिर जबरदस्ती अलग कि जायगी | संसार रूपी नाटकशाला में हमारा फर्ज क्या है ? हमारा फर्ज है हम अपना अभिनय अनासक्ति के साथ करे दुसरे के अभिनय कि चिंता न करके अपने डायलाग ठीक से बोले यदि हम आपसी संबंधो में न्यारे हर्षित , शांत , सच्चे , इमानदार होकर रहते है तो फर्ज है पर यदि अज्ञानतावश क्रोध मोह अहंकार , दिखावा शोषण और दुःख का लें दें करते है तो सम्बन्ध मर्ज बन जाते है |
                      
         पिता परमात्मा कि स्मृति रखे कर्म और अपने बीच

हमारी मताए बहने या अन्य कोई भी जब रशोई में काम करते है तो गर्म पतीले को सीधा ही हाथ से नही पकड़ते बीच में कपडा रखकर पकड़ते है या फिर पकड़ से पकड़ते है क्यों इसलिए कि पतीले कि गर्माहट हाथ को न जल सके ईएसआई प्रकार संसार में रहते कर्म करते फर्ज निभाते हम भी पीटक परमात्मा कि स्मृति और निमित्त भाव को भी बीच में रखे तो फर्ज तो निभेगा पर मर्ज नही बनेगा | फर्ज को ईश्वरीय सेवा समझे |, बच्चे परमात्मा कि अमानत है, मै परमात्मा कि आज्ञा से उनकी पालना करने कि सेवा कर रहा हूँ पत्नी परमात्मा कि संतान है मै परमात्मा कि आज्ञा से उसके साथ से धर्मं कमा रहा हूँ वह सहधर्मिणी है, यह भावना रखे | यदि कार्यव्यवहार करते अति पापात्मा, अपकारी आत्मा बगुले जैसी आत्मा संपर्क में आती है तो उससे भी घ्रणा नहीं , निरादर नहीं , रहम कि तरस कि भावना रख सेवा करे | जैसे डॉक्टर कभी मरीज के लगाव में नहीं आता साक्षी और कल्याणी बन सेवा करता है , ऐसे मोहमुक्त हो सेवाभावी बने 
                 
              शरीर निर्वाह और आत्म निर्वाह

  1. भगवान कहते है, शरीर निर्वाह अर्थात शरीर कि आवश्यकताए पूर्ण करते भी आत्मनिर्वाह अर्थात आत्मा कि आवश्यकताओं को पूर्ण करना ना भूले | धन कमाते भी परमात्मा कि याद कि कमाई करना ना भूले व्यवहारऔर परमार्थ दोनों साथ साथ हो | व्यवहार अर्थात लौकिक और परमार्थ अर्थात परमपिता कि सेवा अर्थ | इस से तन से भी और मन से भी डबल कमाई होती रहेगी | फर्ज निभाते अनेक वस्तुवों ,वैभवो के कनेक्सन में आते है इनके प्रति अनासक्त भाव धारण करे | अनासक्त के आगे ये चीजे दासी के रूप में होंगी और आसक्त को चुम्बक कि तरह खीचकर फंसाने वाली होंगी संसार में परिवारों में सुख के साधन बढ़ रहे है जब साधनों पर आकर्षित हो जाते है साधनों कि होड़ में आ जाते है साधनों के वशीभूत हो जाते है तो साधना भूल जाती जाती है और फर्ज , मर्ज बन जाता है साधनों के आधार पर जीवन ऐसे  है जैसे रेत के आधार पर बिल्डिंग | बार-बार हलचल होगी डगमग होते रहेंगे अतः साधन स्वरुप के बजाये साधना स्वरुप और सिद्धि स्वरुप बने | साधन तो साधना के दस है | साधना बढ़ेगी तो साधन सेवक बनेंगे | बिना साधना के साधन जुटा भी लिए तो मालिक बनकर हमें चलाएंगे , मर्ज बन जायेंगे |

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