Monday, 29 May 2017

ईश्वरीय प्रेम का अनोखा रस



                 

                          
  ईश्वरीय प्रेम का अनोखा रस
शारीरिक, लौकिक अथवा नस्वर सम्बन्धो का रस तो हमने जन्म जन्मान्तर लिया है परन्तु परमात्मा का सम्बोधन करते हुए हम गाते आये है कि हे प्रभु, आप ही हमरे मात-पिता, सखा स्वामी, विद्याप्रदाता और हमारे सर्वस्व (त्वमेव माता च पिता त्वमेव) हो क्या उन सम्बन्धो का अनुभव हमने किया है? जो ऐसे गायन-योग्य , मधुर सम्बन्ध है उनका हम अनुभव ही न करे यह तो गफलत और अल्बेलेपन का सूचक है | जिस प्रभु को प्यार का सागर कहा जाता है, उनको अनोखे प्यार का रस ही जिसने न लिया हो वह कितना भाग्यहीन है | उन जैसा साचा प्यार जिसमे सभी संबंधो कि रसना भरी हुई हो, कोई दे ही नहीं सकता तब यदि वह प्यार हमने न पाया तो क्या पाया?

      मुझे अनुभव है कि जब हम किसी ऐसे बच्चे से बात करते है जिसकी माता या पिता का साया उसके सर से उठ गया हो तो माता या पिता के बारे में उससे पूछने पर उसके नेत्र गिले होने लगते है | परन्तु , हाय हाय , मनुष्य कि यहकैसी कठोरता है कि जो आत्मा का माता पिता और सर्वस्व है उससे सम्बन्ध विच्छेद हुए होने पर उसके मन में उस प्रियतम प्रभु के  प्यार के लिए कसक भी पैदा नहीं होती | क्या मनुष्य के मन में प्यार का पानी सुख गया है?क्या उसके प्यार के सब मोती लुट चुके है ? सांसारिक प्यार के बिना उसे नींद नहीं आती प्रभु का प्यार पाने के लिए उसके पास समय भी नहीं है | यह स्वयं से कैसा धोखा है जिसके कारण मनुष्यत्मा  अपार प्यार से वंचित है!!

हरेक को मालूम  होना चाहिए कि आत्मा ही परमात्मा नहीं है बल्कि परमात्मा से हमारे (आत्मा के) सभी सम्बन्ध है और परमात्मा प्यार का सागर है | वह पयर का सागर अब

बांहे पसार  कर कहता है, मै आपका सच्चा मीत हूँ , मेरे लाल, आओ तुम्हे प्यार के झूले में झुलाऊ , माया के झंझटो से थके मेरे वत्स्य विकारो का विष पीना छोड़ अब अमृत का प्याला पीओ तो मुझ अमरनाथ को आप सामने पाओगे |’

बहुत से ज्ञान निष्ठ , योग  युक्त प्रभु वत्स ऐसे है जिन्हें उस परमपिता का भरपूर प्यार मिला है | प्रभु से सभी सम्बन्धो का प्यार पाने कि अब शुभ वेला है जिसे संगमयुग कहा जाता है | शुंभ अस्तु,शीघ्रं अस्तु!
                  

                
       स्वयं की तलाश


एक पौराणिक कथा है कि एक रजा को वैराग्य आया उन्होंने राज्य का त्याग कर दिया , गेरुए वस्त्र धारण कर लिए और कमण्डल लेकर भिक्षा मांगने निकल पड़े | शाम होने पर कीर्तन करते ,जप करते हवन में भाग लेते पर मन को शांति न मिली | आख़िरकार रजा अपने गुरु के पास पहुंचे और अपनी समस्या सुने | गुरु जी ने गंभीर होकर पूछा जब आप रजा थे ता अपने बगीचे का निरीक्षण कने जाते थे, तो  माली को क्या सावधानियां देते थे? गेरू वस्त्रधारी रजा ने कहा यूँ तो कई प्रकार की सावधानियां देता था पर सबसे ज्यादा जोर बीजो कि उत्तम श्रेणी और जड़ो कि सही देखभाल के बारे में देता था, इसके बिना पौधा या तो सूख जाता है या ठीक से वृद्धि को नहीं पता | गुरूजी ने कहा गेरुए वस्त्र कमण्डल कीर्तन, जप,हवन – ये सब मनो तना पत्ते फूल है  परन्तु बीज और जेड है आत्मा और आत्मा में उठने वाले विचार | जब तक आत्मा को न जाना जाये उसके विचारो को सतोगुणी न बनाया जाये तब तक शांति मिल नहीं सकती |
                                    
        

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