Saturday, 2 September 2017

मुस्कुराने से सभी मुश्किले दूर हो जाती है

       मुस्कुराने से सभी मुश्किले दूर हो जाती है
            
            ऐसे करे इर्ष्या का उन्मूलन 

उपलब्ध इतिहास का अध्ययन करने पर हम पाते है कि बहुत सी स्थितियों में मात्र इर्ष्या विकार ने इतिहास को नकारात्मक रूप दे दिया है | इर्ष्या क्या है ? इर्ष्या क्यों पैदा होती है ? इर्ष्या का मनोवैज्ञानिक पहलु क्या है ? इर्ष्या के कार्यक्षेत्र कौन- कौन से है ? इर्ष्या कैसे दूर हो सकती है?आइये इन प्रश्नों के उत्तर खोजे |
इर्ष्या एक नकारात्मक विचार है जैसे कि यह इअसा क्यों है ? मैंने इतना कुछ किया , मुझे इतना कम क्यों ? इसने तो बहुत कम किया इसे,इतना ज्यादा क्यों? इसे मुझसे ज्यादा क्यों मिला? इसके पास ये-ये प्राप्तियां ज्यादा क्यों है? ये सब इर्ष्या के विचार है | इर्ष्या का अर्थ है , अन्य किसी कि स्थूल सूक्ष्म जो भी प्राप्तियां है उनके प्रति स्वीकार्य भाव का नहीं होना | किसी कि भी , किसी भी भी प्रकार कि श्रेष्ट स्थिति को देखकर खिन्नता कि मनोदशा ही इर्ष्या का वकार है | इस यह प्रकार के भाव में इर्ष्या कि अप्रकट अवस्था होती है | यह हलके रूप कि इर्ष्या होती है |
इस हलके रूप से भी और आगे कि यात्रा करती है इर्ष्या | इर्ष्या का दूसरा प्रकट रूप से भी और आगे कि यात्रा करती है आपको भी नहीं होने दूंगा | इर्ष्या का तीसरा तथा भरी रूप आपको तो ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिये बालक मुझे ही ऐसा होना चाहिए | अपने आपने इतनी उन्नति क्यों कि ? मैंने क्यों नहीं कि ? आपके पास इतना क्योँ ? मेरे पास क्यों नहीं ? आदि-आदि | दुसरो और तीसरे रूप में इर्ष्या केवल संकल्प तक ही सिमित नहीं रहती बल्कि वह कर्मो में भी आने लगती है इर्ष्या जब और तीव्र होती है तो घ्रणा और क्रोध का रूप ले लेती, जैसेकिकिसी को पीछे खीचना (Leg Pulling),  किसी को निचा दिखाना (Humiliate) या अन्य अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुँचाना आदि-आदि |
            इर्ष्या के विषाक्त प्रकम्पनो का प्रभाव

मनुष्य के नकारात्मक संकल्पों से विषाक्त प्रकम्पन फैलाते है | सकारात्मक संकल्पों से अमृत तुल्य प्रकम्पन फैलाते है जैसे क्रोध अग्नि के सामान है वैसे ही इर्ह्स्य भी अग्नि के सामान होती है | इर्ष्या से आंतरिक और बाह्म दोनों प्रकार से विष फैलाते है इर्ष्या करने वाला स्वाम के लिए व दुसरो के लिए अच्छा नहीं सोच सकता | सम्बन्धो कि मधुरता को नष्ट कर देती है इर्ष्या |ईर्ष्यालु के ह्रदय कि प्रेमपूर्ण भावनाए सुख जाती है वह कानाफूसी करके , मीठी जुबान रखते हुए भी सम्बन्धो को तोड़ने में विष का काम करता है इर्ष्या विकार के वशीभूत व्यक्ति दुसरो कि क्षति के लिए को भी स्वीकार कर लेता है इर्ष्या अनेक प्रकार से जीवन को नीरस (निरर्थक) बना देती है इर्ष्या से शारीरिक, मानसिक और आध्यत्मिक तीनो प्रकार से अवनति ही होती है |
                       
               इर्ष्या के कारण 

इर्ष्या का मूल कारण है अन्दर का खालीपन | खालीपन (Hollowness) का अर्थ है आत्मिक उर्जा का अव्यवस्थित (Disorganized) हो नज जिसे दुसरो शब्दों में आत्म-विस्मृति कह सकते है | आत्म-विस्मृति से उपजा अज्ञान ही गहरे में इर्ष्या कारण है | इसी कारण भौतिक साधनों का अम्बर होते भी आदमी स्वाम को रिक्त महसूस कर रहा है हीनता कि ग्रंथि भी इर्ष्या कि प्रस्थ्भूमि है | अज्ञानता कि स्थिति में हीनता का भाव पैदा होना स्वाभाविक है नजदीकी व्यक्ति से इर्ष्या पैदा होने कि सम्भावना ज्यादा होती है | जैसे उत्तरी भारत में रहवे वाले ब्यक्ति को दक्षिणी या पूर्वी भारत या अन्य दूर स्थान पर रहने वाले से इर्ष्या होने कि सम्भावना नहीं होते और प्राथमिक कक्षा में विद्यार्थी से इर्ष्या पैदा होने होने कि सम्भावना नहीं होती | जिनसे हमारा गहरा सम्बन्ध रहा है, यदि हम उन्नति कर उनसे आगे बढ़ नाजते है और उनके प्रति सम्भावना रहती |
                

          इर्ष्या के उन्मूलन के लिए व्यवहार में जीवन मूल्य हो 


इर्ष्या के उन्मूलन के लिए जो आत्माएं हमसे अनुभव ज्ञान (बुद्धी) और आयु में बड़े है उनका शुक्रिया माने | आगे बदना अपने पुरुषार्थ पर न्रिभर होता है लेकिन उन्नति करते हुए भी एक दुसरे के शुक्रगुजार बने | हमारा पारस्परिक मूल्याकन मुल्यानिष्ट हो हमारे व्यवहार में जीवन मूल्य हो ताकि इर्ष्या भाव से बाख जा सके रचनात्मकता के मध्यम से प्राप्त जीवन कि सकारात्मक उपलब्धियों और प्राप्तियों को चाहे वे गुणों कि हो या शक्तिओ कि हो छोटी हो या बड़ी हो भोतिक हो अध्यात्मिक हो या बौद्धिक हो , स्वयं कि हो या अन्यो कि हो , उन्हें स्वीकार करे | स्वयं कि उपलब्धियों के लिए ईश्वर का और सम्बन्धित व्यक्तियों का आभार ब्यक्त करते हुए खुसी का अनुभव करे | दुसरो कि उपलब्धियो में भी ख़ुशी का अनुभव करे , उन में शामिल हो उनकी यथायोग्य प्रशंसा करे और बधाई दे | इअसा समझ कर जिरस ना हो जाये कि इनसे हमारा कोई ताल्लुक नहीं है | श्रेष्ठ पुरुषार्थी को किसी कि श्रेष्ठतादेखकर इर्ष्या पैदा है और आत्म-संतुस्टी अनुभव करता है यह तभी हो सकता है जब आत्मा ज्ञानवान (Knowledgeable)  हो और उसमे रचनात्मकता (Creativity) का गुण हो |

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