Friday, 14 September 2018

जाने नव युग के लिए नवरात्रि


मनाये नव युग के लिए नवरात्रि


जैसे जैसे नवरात्रि का दिन आता, पैर थिरकने लग्गते है | श्री दुर्गा माँ के लिए भक्त व्रत तथा उपवास रखते है | साथ साथ कोई भी पाप कर्म न हो, उसकी परहेज रखते है | नौ दिन का ये लम्बा त्योहार बड़े धूम धाम से हर कोई मनाता है |

‘पूर्व काल में देवताओं और असुरो में पुरे सौ वर्ष तक जो युद्ध हुआ , उसमे असुरों का स्वामी ‘महिषासुर’ देवताओं को हराकर इंद्रा बन बैठा | तब सभी देवताओं ने विष्णु और शिव को क्रोध आया , उनकी भौहें चढ़ गई और मुंह टेढ़ा हो गया | तब विष्णु के मुख से और ब्रह्मा, शंकर तथा इंद्रा आदि के शरीरी से तेज निकला | वह सब मिलकर एक देवी का रूप हो गया शंकर के तेज से उसका मुख , विष्णु के तेज से भुजाएं और यमराज के तेज से उसके सिर के बाल और ब्रह्मा के तेज से उसके शरीर के अन्य भाग हुए | इन्ही का नाम ‘श्री लक्ष्मी’ हुआ | उसी देवी को ही दुर्गा सप्तशती ‘ में भद्रकाली और अम्बिका भी कहा गया है और दुर्गा भी |  उस देवी महालक्ष्मी अथवा दुर्गा के चरणों से पृथ्वी दबती जा रही थी और धनुष की तानकर से पातळ क्षुब्ध होते जा रहे थे |’

आगे लिखा है कि असुरो कि सेना कई अरब और रथ कई करोड़ थे | देवी ने उनसे युद्ध किया | रणभूमि में देवी के जितने श्वास निकले, वे सभी तत्काल ही सैकड़ो हजारो गानों योद्धाओं के रूप में प्रकट हो गए और अस्त्रों-शस्त्रों से वे भी असुरो से लड़ने लगे | देवी ने हुनकर कि और एक असुर सेनापति मर गया | आखिर महिषासुर एक भैंस का रूप धारण कर आगे बढ़ा | उसकी श्वास के प्रचंड वायु के वेग से उड़े हुए सैकड़ो पर्वत खंड आकाश से गिरने लगे | लड़ते लड़ते भैंस का रूप छोड़कर उसने सिंह का रूप, फिर हठी का रूप और अंत में फिर से भैंस से निकल रहा होता है और दुर्गा उसे मार रही होती है, नवरात्रि के अवसर पर अधितर भक्तो को प्रिय लगता है और उसी वृतांत कि प्रायः मूर्तियाँ भी बनती है |
अब आप विचार कीजिये कि यह जो देवी के श्वास योद्धाओं का रूप धारण कर लेते , उसके हूँ कहने से ही एक असुर सेनापति कि मृत्यु हो गई, महिषासुर के प्रचंड वायु के वेग से पर्वत के सैकड़ो दुकड़े  उड़े, उसने भैंस, शेर, हाथी आदि का रूप धारण किया, देवी के पांव टेल पृथ्वी दबी जा रही थी, सातों पातळ क्षुब्ध हो उठे, ये सब वर्कि अजूबे के सिवाय क्या महत्व रखते है | किन्तु यह भी सोचिएकी असुरो कि ये कई अरब सेना और करोड़ रथ ठहरे कहाँ होंगे ? स्पष्ट है की ये सब बातें गलत, असत्य और अमान्य है |

दुर्गा सप्तशती में लिखा है कि पूर्व काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरो ने जब इंद्रा से तीनो लोको का राज्य छीन लिया था तो देवताओं ने हिमालय पर जाकर ‘विष्णुमाया’ कि स्तुति की | उस समय पार्वती जी के सरी-केश से एक देवी का नाम अम्बिका देवी हुआ | इस देवी ने ‘हूँ’ किया तो असुरों कि सेना का मुख्य असुर भस्म हो गया | यह हिमालय पर बैठी थी तो असुरों कि सेना को आते देखकर देवी को क्रोध आया और इनका मुख काला पद गया और वहां से तुरंत विकराल मुखी ‘काली’ देवी प्रकट हुई | उसकी जीभ लपलपाने वाली थी | वो सबका भक्षण करने लगी | वे अंकुशधारी महावतो, योद्धाओं और घंटासहित कितने ही हाथियों तथा घोड़ो को एक ही हाथ से पकड़कर मुंह में डाल लेती और चबा डालती | इन्होने बहुत असुरो को मार डाला | 

अब ऊपर लिखे ये सारे वृतांत जो दिए है, ये बिलकुल  ही भ्रामक मालूम होते है इसके बजाए यदि ये कहा गया होता कि ‘वो देवी चीनी या खांड के बने हाथी, घोड़े और महावतो को खा जाती थी तो वह अच्छा होता |’ चलो उससे मनोविनोद तो हो ही जाता और बात संभव तो मालूम होती |

ये सभी वृतांत के बारे में यदि देखे तो ये काल्पनिक व रूपक के रूप में ही दर्शाया गया है | अब आप ही विचार करे कि ऐसी देवी के श्वास से योद्धायें तैयार हो सकते है ? ब्रह्मा विष्णु शंकर के तेज से कोई देवी प्रकट हो सकती  है ? तो हम आपको यही बताना चाहते है कि आज के युग में बुद्धिशाली, शास्त्रज्ञानी, विद्वान बहुत है, परन्तु उन सबमे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आंशिक रूप में है ही है | तो ये पांचो विकारो का खत्म करने के लिए ही परमात्मा कि शक्ति कि आवश्यकता पड़ती है और उसकी शक्ति कि उपासना से ही शिव शक्तियाँ प्रकट होती है | जिसका नाम देवियों के रूप में जाना जाता है | उनमे भी दुर्गा को विशेष रूप से मानते है, क्य्योंकी दुर्गा माना दुर्गुणों को नाश करने वाली तो इस नवरात्रि के शुभ अवसर पर आप भी अपने में न दिखने वाले असुर के रूप में जो ये विकार छिपे है, उनसे मुक्त होने के लिए व्रत करे और अपने जीवन में परमात्म शक्ति द्वारा देवत्व को धारण करने की शक्ति प्राप्त करे | तभी आपके जीवन में नवसंचार होगा और नवयुग आएगा | इसी भावना से नवरात्रि उत्सव को यादगार रूप में मनाया जाता है तो आइये हम सभी अपने में निहित बुरे रुपी महिषासुर को ख़त्म करे और देवत्व का आगाज करे |

Thursday, 5 July 2018

सोतो को भगवान जगाने आया है इसलिए भगवान ने कहा जागते रहो

(सोतो को भगवान जगाने आया है इसलिए भगवान ने कहा जागते रहो |)

1. स्वयं से प्रश्न करे कि हम इस दुनिया में क्यों आये है आखिर हमारा उद्देश्य क्या है अपने आप को जगाने का प्रयास करे और इन प्रश्नों पर विचार करे जागे तो ऐसे कि अखे बंद होते भी आपका मन सदैव जागते रहे | ताकि कोई चोर आप की खुशियाली प्रसन्नता  उन्नति को कोई चुरा न ले जाए
2.जिसने अपने भाग्य की कलम दूसरे के हाँथ में देदी वही सोता है |
3. जो व्यर्थ की इच्छाओं और आकांक्षाओ में फस रहता है वही सोता है |
4. जो स्वयं की मान सम्मान की कामना वास कोई कार्य करता है वही सोता है |
5. जो खुद की पहचान भूल दूसरो की पहचान के पीछे भागता है , वही सोता है
6.जो दूसरे की कमी कमजोरियों की और बुराइयों को देखने में अपना समय गवाते है वही सोता है
7.जो दूसरो की उन्नति देख इर्ष्या वश उसकी आलोचना में लगा रहता है वही सोता है
8. जो मियां मिट्ठू बनता है खुद ही खुद की बुद्धिमता की तारीफ करते नहीं भागता, वही सोता है
9. जो अपने जीवन में कोई योजना या कोई लक्ष्य लेकर नहीं चलता यदि वो नहीं जानता है कि उसे क्या करना है वही सोता है |
10.इसी तरह सोते रहेंगे तो यह समय लौट कर नहीं आएगा
11.इस निद्रा से जागे और स्वयं से प्रश्न करो कि 24 घंटे में कितना समय आत्मा चिंतन में व्यतीत करते है |
12.कितना समय दूसरो की निःस्वार्थ सेवा में व्यतीत करते है  |
13.कितना समय अपने परमात्मा को याद करते है
14.भूत और भविष्य की चिंता छोड़ वर्तमान को सफल करते है |
15.समय रहते उसका सदउपयोग कर लो नहीं तो हाथ मलते रहना होगा |


नोट – 1. भगवान मुर्दे को जिन्दा कैसे करते है लोग कहते कि भगवान मुर्दे को भी जिन्दा करते लेकिन कैसे करते है यह नहीं जानते 

2.अभी ख़ुशी है कि बाप ने हमें जलती हुई चिता से उठा कर हमें अमर बना दिया |
3.पवित्र ब्राह्मण जीवन का वरदान है पवित्र संकल्प ब्राह्मण जीवन की बुद्धि का भोजन है पवित्र द्रष्टि ब्राह्मण जीवन की रोशनी है | पवित्र कर्म ब्राह्मण जीवन का धंधा है
4. पवित्र सम्बन्ध और सम्पूर्ण ब्राह्मण जीवन की मर्यादा है |
5. पवित्रता के आधार से आदि ब्रह्मा ने आदि देव आदि प्रिंश बने |
6.आत्मा तत्व को जानना और परमात्म तत्व को पहचानना यही ज्ञान है इसके विपरीत सब अज्ञान है |
7. सांसारिक ज्ञान से बाहरी सुख मिलता है आधात्मिक ज्ञान से आंतरिक सुख मिलता है इससे जीवन मूल्यवान बन जाता है
8. गुणों के आधार से आत्मा को उंच नीच जन्म मिलता है | दुनिया कब बदलती है इस बात को कोई नहीं जानता है | किसी की निंदा करते हो तो उसके कर्मो का भोग आप को भोगना पड़ेगा
9. विपरीत समय आने पर धैर्य कभी नहीं छोड़ना चाहिए

मुख्यालय – प्रजापिता ब्रह्मा कुमरिज ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउन्ट आबू, राजस्थान भारत


                    
                                                    बी० के० रामपाल 


Monday, 25 June 2018

Seven Spiritual Wonders


Seven Spiritual Wonders
The seven wonders of the world are well known. There are money lists of these wonders that catalogue the spectacular monuments and natural structures. These are called wonders because they represent magnificence, beauty, workmanship, artistry and creativity of humans. The Great Wall of China, Coliseum in Rome and the Taj Mahal in India are all listed as new wonders of the world lists some ancient structures of which most have to destroy with time.
While lot of humans know about theses physical wonders of very few people on earth are aware about the seven spiritual wonders. These spiritual truths are called wonders because they fill us with a sense of awe, a sense of our won infinity, our grand exalted self and the magnificence of the entire human journey, and above all an overwhelming sense of gratitude and love for the benevolence of God, the Creator, Theses Spiritual wonders or truths have been revealed by God, the Supreme Soul, Himself.
Soul: Perhaps the Greatest wonder is of our true identity we are not human beings but we are spiritual beings soul an infinitesimal point of light, sentient and alive. The soul has three subtle facilities the mind, intellect and sankars though which it performs its role in this world. It is the soul that animates the body and expresses itself though the sense organs and creators thoughts, emotions, ideas, beliefs and attitudes. It is a wonder that a tiny being of energy moves a big physical form, in fact a lot of physical conditions are influenced by the soul’s energy in the form of its thoughts and sanskars. Even the kind of body that a soul gets birth after birth depends on the sanskars of the soul.
God: The one Being who is revered and remembered by most human beings is God the souls who is supreme amongst all  souls. He is the eternal Fathers, the Almighty Authority, omnipotent, omniscient, the Liberator, Guide and purifier of all Creation, God is beyond the bondage of life and Death, Karma, joy and sorrow but He knows everything about our human condition and restores it to its original pristine stage though His wisdom and love. The greatest wonder about God is that He manifests in a human medium to purify the old impure world into a new world of peace, happiness and purity heaven or satyuga. He is the most incognito subtitle spiritual powerhouse who performs the greatest act of liberating human being form the cycle of sin and suffering yet very few human beings know him.
Soul world and subtle world: None of the human beings know where they have come form and where they will finally arrive at the end of their earthly journey. God has revealed that there are three worlds. All souls live in the incorporeal souls world Paramdham far beyond this physical universe. It is a timeless eternal world where souls live in their absolute original identify as pure points of light energy silent, pure and liberated. No soul can go back to the eternal home unless it test purified at the end of Kalyuga when God guides us back home the subtle angelic world is a world where human beings exist as angelic beings after finishing all earthly carmic accounts and becoming completely pure. From here they help in God,s task of world transformation through their powerful pure vibrations of peace and compassion. World Drama: The most wonderful secret revealed by God is about the interplay of souls and matter in the physical world called Drama. According to the truth revealed by God the world Drama goes on in a cyclic time frame lasting 5000 years which is divided into four equal ages or yugas and a fifth age Sangamyuga which is a confluence of Kaliyuga and satyuga. God comes and rejuvenates the  world in this special fifth yuga. Moreover this Drama repeats identically after every cycle, i.e.5000 Years.
Karma: the law of Karma is also a spiritual wonder because it acts as a great balancing force leveling all the actions being performed by humans on earth. Good actions beget Good experiences in life and bad actions are followed by suffering and misery. The law of Karma works infallibly, without any partiality or bias towards anyone. It brings divine justice to the entire Drama and makes humans responsible for creating their destiny by acting according to good values. God does not punish or reward us, it is this law of karma that operates automatically to balance our good and bad deeds.
Satyuga: The new world that God creates is called Heaven or Satyuga. Only pure human souls exemplifying divine virtues live there. Everything in that world is perfect. There is no trace of sorrow or anything negative. Everyone is healthy, has a long lifespan and abundant resources. Everything in that world, including human birth happen by soul power. Hum so so Hum. Most humans pray to God in order to seek peace and happiness in their worldly life. But God comes and reminds us that once upon time we souls lived on earth as deities and we can again directions to purify the self .
Yoga: The most amazing and powerful tool that God give us is Rajyoga connecting ourselves wholeteartedly to God .This is possible only when we become souls conscious and surrender our attachment and ego and live in this world as God’s child or as His instrument eschewing all vices and imbibing all virtues live as a karmayogi. It is though the power of yoga that God helps us to become pure again and change this Kaliyoga into satyuga. Who can imagine that such a subtle and incognito act of satying in constant loving remembrance of God can transformation of the entire creation.
These seven spiritual wonders are available for experiencing right now in this life.

Sunday, 10 June 2018

The Journey from absolute truth to total untruth Virtual Reality


The Journey from absolute truth to total untruth
Virtual Reality
Virtual reality is being touted as a business that will be worth scullions of dollars in the coming years. The simulation of realistic experiences through computer-generated environments is expected to have a wide variety of uses in many fields, from education and medicine to entertainment.
Virtual reality headsets fit around a person’s head and over their eyes, and visually separate they form the space they are physically occupying. Images are fed to the eyes from two small lenses. The immersive environment can be similar to the real world in order to create a lifelike experience.
A well-built virtual reality program can create a sense of actually being inside an alternative reality, and one effect of virtual reality is that is boosts the emotional intensity of  whatever a user is experiencing, partly because of the experience’s all-enveloping nature.
The move from real experiences to Artificial and now virtual ones is symptomatic of our times. There was a time when people used to meet, sit down together and have conversations, exchanging news, ideas, and opinions and sharing their thoughts and feeling. This was replaced by technological communication, through phones and computers, but still one interacted with a real person at the other end. Virtual reality isolates one form the real world altogether and transports one to a world of illusion where one can lose oneself with no awareness of time or place.
Virtual reality, by its very name, appears to indicate the culmination of the human soul’s
Journey from absolute truth to total untruth. Though current users of virtual reality can experience unwanted symptoms such as headache, nausea and disorientation, experts foresee more and more people spending time in virtual space’ in future..
Even though virtual reality experiences are yet to become commonplace, a lot of people in the world live cut off from those around them, interacting more with electronic devices than real people.Thier eyes are glued to mobile phones, computer or television screens, and food, sleep and the care children or elderly family members are all sacrificed for the pleasure provided by the sounds and images on the LCD displays.
This is a manifestation of the human soul’s transition form a state of absolute purity and truth to one of total impurity before it undergoes rejuvenation. When the souls begin to play its part in this world, it is in its original, complete state. It expresses its innate virtues, such as truth,
Peace and love. However, as the soul comes in contact with others souls and matter, they begin to influence it.
The souls gradually lose its power and virtues over successive lives. From its pure state it reaches a condition where it has virtues as well as vices in varying degrees. The thoughts, words and actions of the souls are influenced by this inner state. Then, a time comes when the soul’s original qualities are completely overshadowed by vices, and it can be said to have become totally impure or false.
The world of lies, fiction, false appearances, synthetic goods, lab-gown synthetic organisms, artificial intelligence and augmented and virtual reality is the creation of souls who have lost touch with their of these qualities, it is times for their rejuvenation. The Supreme soul, who is ever-pure and unchanging, awakens in souls the memory of who they really are, and teaches them to connect with Him so that they can regain their true status and become whole again. Souls who carry out this self- transformation become instrumental in bringing about a similar change in the world, once again ushering in satyug  the age of absolute truth.



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